गुरुवार, 30 जुलाई 2026
हमारे राम राज्य का मतलब?!
हमारा राम सिर्फ दशरथ का बेटा नहीं है.
वह तो कण कण में, सर्वत्र व्याप्त है, हर व्यक्ति, वनस्पति, जन्तु में है!
जो मनुष्य उसके आभास में जीने लगता है, उसके लिए न कोई अपना न कोई पराया रह जाता है।
वह उस दशा में जीने लगता जिसे हम कहते हैं सागर में कुम्भ, कुम्भ में सागर।
ऐसे में जो कहते हैं कि राजा दार्शनिक होना चाहिए, हम उस पर विश्वास करते हैं और इस पर भी विश्वास करते हैं कि राजा ईश्वर का दूत होता है।
आखिर यह कैसे?!
जो वास्तव में दार्शनिक होता है वह तो सबमें एक ही भाव देखता है।
तब प्रकट होती है -कहावत यथा राजा तथा प्रजा!!
और ऐसे में समाज भी क्या होता है उसका... सम +अज.. सबमें अज अर्थात दिव्यता का भाव जहां सम?!
अब बात आती है दशरथ पुत्र राम की तो कहना चाहेंगे हम कि इस पर मतभेद हो सकते हैं. जगत में तो विभिन्नता है, सबकी समझ अलग अलग होती है, नजर की सामर्थ्य भी अलग अलग होती है!
फिर भी...
❤️रामराज्य का मतलब क्या था?!❤️
राज्य में किसी को किसी भी प्रकार का कष्ट न था!!
🙏हमें हिन्दू राष्ट्र चाहिए या रामराज्य?!🙏
😭...और फिर " हिन्दू " -शब्द का प्रचलन कब से? मुश्किल से 600वर्षों से? 😭
भारत के विकास का मतलब है, विकास हर भारतीय, भारत के हर परिवार me दिखना चाहिए?!
❤️ब्राह्मण हर युग में सम्मान के योग्य रहा है। आज फिर जरूरत है अपनी चेतना को ब्राह्माण्ड चेतना /ब्राह्मणत्व से जोड़ने को!❤️
🙏सतयुग में हम यों ही अपनी आज की सोंच में प्रवेश से प्रवेश नहीं कर सकते!!सूक्ष्म जगत में ब्राह्मड चेतना के विभिन्न स्तरों से कार्य जारी है, जिसे हम महसूस कर रहे हैं!!🙏
👍आज के सिस्टम, समाज आदि में हम मक्कार, कामचोर, आलसी आदि हो सकते हैँ जिसमें हमारे लिए कोई समाधान नहीं लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हमारे द्वारा काम नहीं हो रहा है? 👌
❤️ख़ामोशी, शांति में अनेक राज अनंत तक दस्तक वाले भी हो सकते हैँ?!❤️
Ashok kumar verma "bindu "
मंगलवार, 14 जुलाई 2026
हम एक विश्व नागरिक, विश्व व प्रकृति हमारा राज्य?!
❤️आदिवासी धर्म?!❤️
जब न शहर थे, न गाँव… जब चारों ओर केवल प्रकृति थी… तब क्या था धर्म?
🌿 आदिवासियों का धर्म है —
प्रकृति के साथ जीना!
धरती को माता मानना!
जंगल, जल, जमीन की रक्षा करना!
❓आज जो धर्म के नाम पर विभाजन है…
क्या वह वास्तविक धर्म है?
📖 श्रीकृष्ण का संदेश: "सर्व धर्मों को त्यागकर मेरी शरण में आओ" 👉 क्या यह संकेत नहीं कि
सच्चा धर्म बाहरी नहीं…
अंदर की चेतना और सत्य है?
🌍 धर्म वह है — जो धारण करे जीवन को,
जो जोड़ दे मानव को प्रकृति से,
जो बनाए मानव को मानव!
🔥 आदिवासी मांगें: ✔ जल, जंगल, जमीन पर अधिकार
✔ संस्कृति और अस्तित्व की रक्षा
✔ सम्मान के साथ जीवन
🙏 सोचिए… क्या हम अपने मूल धर्म से भटक गए हैं?
"प्रकृति ही धर्म है —
और मानवता ही उसका मार्ग!"
✍️ अशोक कुमार वर्मा "बिंदु"
🌐 www.akvashokbindu.blogspot.com
शुक्रवार, 3 जुलाई 2026
उठो अशोक!!तुम तो अपने क्षेत्र के राजा हो?!
किस क्षेत्र में राजा?!हम ये कब समझें?!
सात आठ वर्ष पहले हमने देखा था कि चारों ओर लाश ही लाश, हमें लशों में अपने शरीर को छिपा रहे हैं?!
शीर्षक: "उठो अशोक!"
🎵 बैकग्राउंड म्यूजिक: धीमा, भयावह (सस्पेंस + इमोशनल)
📍 सीन 1: विनाश का दृश्य (जलती हुई धरती, भूकंप, बाढ़, सूखा, पेड़ों की कटाई)
🎙️ वॉइसओवर: "चारों ओर लाशें ही लाशें... पूरी धरती पर हाहाकार... कहीं आगजनी... कहीं भूकंप... कहीं बाढ़... कहीं सूखा... जंगल कट रहे हैं... पहाड़ टूट रहे हैं..."
📍 सीन 2: युवक (अशोक) (एक युवक लाशों के बीच छिपने की कोशिश करता है, डरा हुआ)
🎙️ वॉइसओवर: "इस भयावह समय में... एक युवक... खुद को बचाने के लिए... लाशों के नीचे छिप रहा है..."
📍 सीन 3: संतों का आगमन (धीमी रोशनी, सफेद वस्त्र पहने संत प्रकट होते हैं)
🎵 म्यूजिक बदलकर शांत और दिव्य
🎙️ संत (संवाद): "अशोक! उठो... तुम अपने क्षेत्र के राजा हो!"
📍 सीन 4: जागृति (अशोक धीरे-धीरे उठता है, आंखों में आत्मविश्वास आता है)
🎙️ वॉइसओवर: "जो डर गया... वो खत्म हो गया... जो उठ गया... वही बदलाव लाएगा!"
📍 सीन 5: परिवर्तन (अशोक लोगों को बचाता हुआ, पेड़ लगाता हुआ, नेतृत्व करता हुआ)
🎙️ वॉइसओवर: "एक व्यक्ति भी... पूरी दुनिया बदल सकता है..."
📍 अंतिम सीन: संदेश (स्क्रीन पर टेक्स्ट)
✨ "उठो... जागो... और बदलाव बनो!"
🎵 म्यूजिक: प्रेरणादायक (उम्मीद भरा)
माँ सीता अब भी बनवास में?!
यह सत्य है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है।
लेकिन इसे कौन महसूस कर सकता है?!
जब श्री राम मंदिर का शिलान्यास होने को था तब सूक्ष्म जगत में कुछ अहसासों के बीच मेरा एक अहसास था कि माता सीता अब भी जंगल में हैं!!
धरती माता अब भी दुःखी हैं?!
इस पर हम अपनी एक पुस्तक तैयार कर चुके हैं -"सीतायण?!"
आप सब का सहयोग हमें उसे प्रकाशित करने में मदद करेगा?!
सत्तावाद,पूंजीवाद, सामंतवाद, जन्मजात निम्नवाद, जन्मजात उच्चवाद, खाद्य मिलावट, जंगल कटान, पहाड़ कटान आदि धरती माता, प्रकृति माँ को दुःखी किए है।
सन 2011-25ई 0 के पड़ाव के बाद अब नया पड़ाव शुरू हो चुका है जिसमें एक बदलाव यह भी देखने को मिल रहा है कि कुछ संतों के साथ हिन्दू मुसलमान आदि सब साथ आ रहे हैं!
कल्कि अवतार /ईमाम मेंहदी का अभियान सज्ज हो चुका है!
यह अंश एक आध्यात्मिक, भावनात्मक और सामाजिक चिंतन को व्यक्त करता है। इसकी व्याख्या को हम सरल बिंदुओं में समझ सकते हैं:
🔹 1. “यह सत्य है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है…”
यहाँ लेखक यह कहना चाहता है कि कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिन्हें तर्क या प्रमाण से नहीं, बल्कि अंतरात्मा और अनुभूति से ही समझा जा सकता है। यह आध्यात्मिक अनुभव की बात है, जो हर व्यक्ति को समान रूप से नहीं होता।
🔹 2. “माता सीता अब भी जंगल में हैं… धरती माता दुःखी हैं”
यह एक प्रतीकात्मक (symbolic) अभिव्यक्ति है।
“माता सीता” यहाँ त्याग, पीड़ा और अन्याय का प्रतीक हैं।
“धरती माता दुःखी हैं” का अर्थ है कि आज के समय में
पर्यावरण का नाश (जंगल कटान, पहाड़ कटान)
समाज में अन्याय और असमानता
इन सबके कारण प्रकृति और मानवता दोनों पीड़ा में हैं।
🔹 3. “सीतायण” पुस्तक का विचार
लेखक अपनी अनुभूतियों को एक पुस्तक “सीतायण” के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है।
यह संभवतः रामायण की कथा से प्रेरित होकर आधुनिक समाज की समस्याओं को दिखाने का प्रयास है—जहाँ सीता का दुःख आज की धरती और समाज के दुःख से जोड़ा गया है।
🔹 4. सामाजिक समस्याओं का उल्लेख
“सत्तावाद, पूंजीवाद, सामंतवाद…” आदि शब्दों के माध्यम से लेखक यह बताना चाहता है कि:
सत्ता का दुरुपयोग
धन की असमानता
ऊँच-नीच की सोच (जाति/जन्म आधारित भेदभाव)
मिलावटी भोजन और पर्यावरण विनाश
ये सभी मिलकर धरती और समाज को कष्ट पहुँचा रहे हैं।
🔹 5. “नया पड़ाव” और एकता का संदेश
लेखक आशा व्यक्त करता है कि अब एक नया समय आ रहा है:
जहाँ अलग-अलग धर्मों (हिंदू, मुस्लिम आदि) के लोग साथ आ रहे हैं
संतों और आध्यात्मिक विचारों के माध्यम से एकता और बदलाव संभव है
🔹 6. “कल्कि अवतार / ईमाम मेहदी का अभियान”
यहाँ दो अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं का उल्लेख है:
कल्कि अवतार (हिंदू धर्म)
इमाम मेहदी (इस्लाम)
दोनों को यहाँ एक बदलाव और न्याय के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
अर्थ यह है कि समय आने पर अधर्म और अन्याय के विरुद्ध एक बड़ा परिवर्तन होगा।
✅ समग्र अर्थ
यह पूरा लेख एक संदेश देता है कि:
दुनिया में बहुत अन्याय, असंतुलन और पर्यावरण विनाश हो रहा है
यह स्थिति “सीता के दुःख” के समान है
लेकिन आने वाले समय में एकता, आध्यात्मिक जागरूकता और परिवर्तन के माध्यम से सुधार संभव है
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