गुरुवार, 30 जुलाई 2026

हमारे राम राज्य का मतलब?!

हमारा राम सिर्फ दशरथ का बेटा नहीं है. वह तो कण कण में, सर्वत्र व्याप्त है, हर व्यक्ति, वनस्पति, जन्तु में है!
जो मनुष्य उसके आभास में जीने लगता है, उसके लिए न कोई अपना न कोई पराया रह जाता है। वह उस दशा में जीने लगता जिसे हम कहते हैं सागर में कुम्भ, कुम्भ में सागर। ऐसे में जो कहते हैं कि राजा दार्शनिक होना चाहिए, हम उस पर विश्वास करते हैं और इस पर भी विश्वास करते हैं कि राजा ईश्वर का दूत होता है। आखिर यह कैसे?! जो वास्तव में दार्शनिक होता है वह तो सबमें एक ही भाव देखता है। तब प्रकट होती है -कहावत यथा राजा तथा प्रजा!! और ऐसे में समाज भी क्या होता है उसका... सम +अज.. सबमें अज अर्थात दिव्यता का भाव जहां सम?! अब बात आती है दशरथ पुत्र राम की तो कहना चाहेंगे हम कि इस पर मतभेद हो सकते हैं. जगत में तो विभिन्नता है, सबकी समझ अलग अलग होती है, नजर की सामर्थ्य भी अलग अलग होती है! फिर भी... ❤️रामराज्य का मतलब क्या था?!❤️ राज्य में किसी को किसी भी प्रकार का कष्ट न था!! 🙏हमें हिन्दू राष्ट्र चाहिए या रामराज्य?!🙏 😭...और फिर " हिन्दू " -शब्द का प्रचलन कब से? मुश्किल से 600वर्षों से? 😭 भारत के विकास का मतलब है, विकास हर भारतीय, भारत के हर परिवार me दिखना चाहिए?! ❤️ब्राह्मण हर युग में सम्मान के योग्य रहा है। आज फिर जरूरत है अपनी चेतना को ब्राह्माण्ड चेतना /ब्राह्मणत्व से जोड़ने को!❤️ 🙏सतयुग में हम यों ही अपनी आज की सोंच में प्रवेश से प्रवेश नहीं कर सकते!!सूक्ष्म जगत में ब्राह्मड चेतना के विभिन्न स्तरों से कार्य जारी है, जिसे हम महसूस कर रहे हैं!!🙏 👍आज के सिस्टम, समाज आदि में हम मक्कार, कामचोर, आलसी आदि हो सकते हैँ जिसमें हमारे लिए कोई समाधान नहीं लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हमारे द्वारा काम नहीं हो रहा है? 👌 ❤️ख़ामोशी, शांति में अनेक राज अनंत तक दस्तक वाले भी हो सकते हैँ?!❤️ Ashok kumar verma "bindu "

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

हम एक विश्व नागरिक, विश्व व प्रकृति हमारा राज्य?!

❤️आदिवासी धर्म?!❤️
जब न शहर थे, न गाँव… जब चारों ओर केवल प्रकृति थी… तब क्या था धर्म? 🌿 आदिवासियों का धर्म है — प्रकृति के साथ जीना! धरती को माता मानना! जंगल, जल, जमीन की रक्षा करना! ❓आज जो धर्म के नाम पर विभाजन है… क्या वह वास्तविक धर्म है? 📖 श्रीकृष्ण का संदेश: "सर्व धर्मों को त्यागकर मेरी शरण में आओ" 👉 क्या यह संकेत नहीं कि सच्चा धर्म बाहरी नहीं… अंदर की चेतना और सत्य है? 🌍 धर्म वह है — जो धारण करे जीवन को, जो जोड़ दे मानव को प्रकृति से, जो बनाए मानव को मानव! 🔥 आदिवासी मांगें: ✔ जल, जंगल, जमीन पर अधिकार ✔ संस्कृति और अस्तित्व की रक्षा ✔ सम्मान के साथ जीवन 🙏 सोचिए… क्या हम अपने मूल धर्म से भटक गए हैं? "प्रकृति ही धर्म है — और मानवता ही उसका मार्ग!" ✍️ अशोक कुमार वर्मा "बिंदु" 🌐 www.akvashokbindu.blogspot.com

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

उठो अशोक!!तुम तो अपने क्षेत्र के राजा हो?!

किस क्षेत्र में राजा?!हम ये कब समझें?! सात आठ वर्ष पहले हमने देखा था कि चारों ओर लाश ही लाश, हमें लशों में अपने शरीर को छिपा रहे हैं?!
शीर्षक: "उठो अशोक!" 🎵 बैकग्राउंड म्यूजिक: धीमा, भयावह (सस्पेंस + इमोशनल) 📍 सीन 1: विनाश का दृश्य (जलती हुई धरती, भूकंप, बाढ़, सूखा, पेड़ों की कटाई) 🎙️ वॉइसओवर: "चारों ओर लाशें ही लाशें... पूरी धरती पर हाहाकार... कहीं आगजनी... कहीं भूकंप... कहीं बाढ़... कहीं सूखा... जंगल कट रहे हैं... पहाड़ टूट रहे हैं..." 📍 सीन 2: युवक (अशोक) (एक युवक लाशों के बीच छिपने की कोशिश करता है, डरा हुआ) 🎙️ वॉइसओवर: "इस भयावह समय में... एक युवक... खुद को बचाने के लिए... लाशों के नीचे छिप रहा है..." 📍 सीन 3: संतों का आगमन (धीमी रोशनी, सफेद वस्त्र पहने संत प्रकट होते हैं) 🎵 म्यूजिक बदलकर शांत और दिव्य 🎙️ संत (संवाद): "अशोक! उठो... तुम अपने क्षेत्र के राजा हो!" 📍 सीन 4: जागृति (अशोक धीरे-धीरे उठता है, आंखों में आत्मविश्वास आता है) 🎙️ वॉइसओवर: "जो डर गया... वो खत्म हो गया... जो उठ गया... वही बदलाव लाएगा!" 📍 सीन 5: परिवर्तन (अशोक लोगों को बचाता हुआ, पेड़ लगाता हुआ, नेतृत्व करता हुआ) 🎙️ वॉइसओवर: "एक व्यक्ति भी... पूरी दुनिया बदल सकता है..." 📍 अंतिम सीन: संदेश (स्क्रीन पर टेक्स्ट) ✨ "उठो... जागो... और बदलाव बनो!" 🎵 म्यूजिक: प्रेरणादायक (उम्मीद भरा)

माँ सीता अब भी बनवास में?!

यह सत्य है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। लेकिन इसे कौन महसूस कर सकता है?! जब श्री राम मंदिर का शिलान्यास होने को था तब सूक्ष्म जगत में कुछ अहसासों के बीच मेरा एक अहसास था कि माता सीता अब भी जंगल में हैं!! धरती माता अब भी दुःखी हैं?! इस पर हम अपनी एक पुस्तक तैयार कर चुके हैं -"सीतायण?!" आप सब का सहयोग हमें उसे प्रकाशित करने में मदद करेगा?! सत्तावाद,पूंजीवाद, सामंतवाद, जन्मजात निम्नवाद, जन्मजात उच्चवाद, खाद्य मिलावट, जंगल कटान, पहाड़ कटान आदि धरती माता, प्रकृति माँ को दुःखी किए है। सन 2011-25ई 0 के पड़ाव के बाद अब नया पड़ाव शुरू हो चुका है जिसमें एक बदलाव यह भी देखने को मिल रहा है कि कुछ संतों के साथ हिन्दू मुसलमान आदि सब साथ आ रहे हैं! कल्कि अवतार /ईमाम मेंहदी का अभियान सज्ज हो चुका है! यह अंश एक आध्यात्मिक, भावनात्मक और सामाजिक चिंतन को व्यक्त करता है। इसकी व्याख्या को हम सरल बिंदुओं में समझ सकते हैं: 🔹 1. “यह सत्य है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है…” यहाँ लेखक यह कहना चाहता है कि कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिन्हें तर्क या प्रमाण से नहीं, बल्कि अंतरात्मा और अनुभूति से ही समझा जा सकता है। यह आध्यात्मिक अनुभव की बात है, जो हर व्यक्ति को समान रूप से नहीं होता। 🔹 2. “माता सीता अब भी जंगल में हैं… धरती माता दुःखी हैं” यह एक प्रतीकात्मक (symbolic) अभिव्यक्ति है। “माता सीता” यहाँ त्याग, पीड़ा और अन्याय का प्रतीक हैं। “धरती माता दुःखी हैं” का अर्थ है कि आज के समय में पर्यावरण का नाश (जंगल कटान, पहाड़ कटान) समाज में अन्याय और असमानता इन सबके कारण प्रकृति और मानवता दोनों पीड़ा में हैं। 🔹 3. “सीतायण” पुस्तक का विचार लेखक अपनी अनुभूतियों को एक पुस्तक “सीतायण” के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। यह संभवतः रामायण की कथा से प्रेरित होकर आधुनिक समाज की समस्याओं को दिखाने का प्रयास है—जहाँ सीता का दुःख आज की धरती और समाज के दुःख से जोड़ा गया है। 🔹 4. सामाजिक समस्याओं का उल्लेख “सत्तावाद, पूंजीवाद, सामंतवाद…” आदि शब्दों के माध्यम से लेखक यह बताना चाहता है कि: सत्ता का दुरुपयोग धन की असमानता ऊँच-नीच की सोच (जाति/जन्म आधारित भेदभाव) मिलावटी भोजन और पर्यावरण विनाश ये सभी मिलकर धरती और समाज को कष्ट पहुँचा रहे हैं। 🔹 5. “नया पड़ाव” और एकता का संदेश लेखक आशा व्यक्त करता है कि अब एक नया समय आ रहा है: जहाँ अलग-अलग धर्मों (हिंदू, मुस्लिम आदि) के लोग साथ आ रहे हैं संतों और आध्यात्मिक विचारों के माध्यम से एकता और बदलाव संभव है 🔹 6. “कल्कि अवतार / ईमाम मेहदी का अभियान” यहाँ दो अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं का उल्लेख है: कल्कि अवतार (हिंदू धर्म) इमाम मेहदी (इस्लाम) दोनों को यहाँ एक बदलाव और न्याय के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अर्थ यह है कि समय आने पर अधर्म और अन्याय के विरुद्ध एक बड़ा परिवर्तन होगा। ✅ समग्र अर्थ यह पूरा लेख एक संदेश देता है कि: दुनिया में बहुत अन्याय, असंतुलन और पर्यावरण विनाश हो रहा है यह स्थिति “सीता के दुःख” के समान है लेकिन आने वाले समय में एकता, आध्यात्मिक जागरूकता और परिवर्तन के माध्यम से सुधार संभव है

गुरुवार, 18 जून 2026

कटरा की दस्तक :एक अंतर्मन की यात्रा!

शीर्षक: “कटरा की दस्तक — एक अंतर्मन की यात्रा” इन दस सालों में मीडिया क्या हो गई है—यह सवाल अक्सर मेरे भीतर गूंजता रहता है। कभी समाज और व्यक्ति के बीच खड़े होकर सच्चाई बटोरने वाले पत्रकार आज कहीं खो गए लगते हैं। अब वे सच्चाई के खोजी नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों के चक्कर लगाने वाले बन गए हैं—नेताओं, माफियाओं, बिजनेस मैन और धर्म के सौदागरों के इर्द-गिर्द घूमते हुए, अपने धंधे को ही पत्रकारिता समझ बैठे हैं। और फिर मैं अपने अतीत में लौटता हूँ…
वह समय जब “किशोर अशोक” मेरी कहानियों का नायक था—सपनों से भरा, जिज्ञासु, और सच्चाई की तलाश में भटकता हुआ। और आज… मैं खुद को देखता हूँ—क्या वही हूँ मैं? 01 जून 2004… जनपद शाहजहांपुर के मीरनपुर कटरा में मेरी दस्तक। यह कोई साधारण घटना नहीं थी—यह मेरे जीवन का एक मोड़ था, शायद ईश्वरीय संकेत। कटरा के सुपर मार्केट में “मीत एजेंसी” पर मैंने अपने समय को नई दिशा दी। कंप्यूटर और प्रिंट के कार्य के बीच, मेरे भीतर छिपा लेखक फिर जागने लगा। यहीं से मेरे ब्लॉग की शुरुआत हुई—www.akvashokbindu.blogspot.com—और इसके साथ ही कई और ब्लॉग भी बने। मैंने अपने किशोरावस्था से लेकर अब तक की लेखन सामग्री को सहेजना और प्रिंट करना शुरू किया। धीरे-धीरे, मेरी सोच और शब्द इंटरनेट की दुनिया में प्रवेश करने लगे। यहाँ तक कि मैंने अमेरिकी राष्ट्रपति भवन की वेबसाइट पर भी लिखना शुरू किया। यह एक नया संसार था—ऑनलाइन विश्व—जहाँ मेरी पहुँच बन रही थी। लेकिन इस सफर की एक कीमत भी थी… सामाजिक, आर्थिक और पैतृक स्तर पर मैं अलग-थलग पड़ता गया। जहाँ बाहर की दुनिया से दूरी बढ़ी, वहीं अंदर की दुनिया और गहरी होती गई। मैं मानव शांति, मानवता, प्रकृति, ब्रह्मांड चेतना और एलियन्स जैसे विषयों में डूबता चला गया। मेरे भीतर एक अलग ही खोज शुरू हो चुकी थी—एक ऐसी खोज, जो दिखती नहीं, लेकिन महसूस होती है। इस दौरान मुझे मेडिटेशन की आवश्यकता महसूस हुई। मैंने अपने आसपास की सूक्ष्म ऊर्जा और चेतना को अनुभव करना शुरू किया। लेकिन मेरी संवेदनशीलता ही मेरी कमजोरी बनती जा रही थी। पैतृक कुरीतियाँ, सामाजिक संकीर्णता और भीड़-भाड़ मुझे भीतर से विचलित करने लगी। ऐसा लगने लगा कि इस दुनिया में सहज रहना आसान नहीं है। इसी बीच, मेरे साथ पढ़ाने वाले अनिरुद्ध सिंह यादव ने मुझे कटरा में रोक लिया। मैं तो बरेली लौटने वाला था—जहाँ से आया था—लेकिन शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था। मेरे साहित्य का पात्र “किशोर अशोक” अब सोशल मीडिया पर जीवित होने लगा था। मेरी कल्पनाएँ अब शब्दों से निकलकर लोगों तक पहुँचने लगी थीं। कटरा में ही मेरी मुलाकात फरीद अंसारी से हुई, जो उन दिनों “राष्ट्रीय सहारा” में पत्रकार थे। उन्होंने मेरी अभिव्यक्ति को एक मंच दिया। मैं नियमित पाठक बना, और धीरे-धीरे मेरी रचनाएँ भी प्रकाशित होने लगीं। यह मेरे लिए एक नई शुरुआत थी। लेकिन समय के साथ एक सच्चाई और स्पष्ट होती गई… सन 2006 आते-आते मुझे यह महसूस होने लगा कि पैतृकों से कोई उम्मीद रखना व्यर्थ है। मैं सबसे बड़ा होने के बावजूद, परिवार में सबसे पीछे छूटता जा रहा था। मेरे छोटे भाई-बहन शादीशुदा हो गए, और मैं… वहीं खड़ा रह गया। न परिवार में कोई ऐसा था जो मेरे भविष्य को लेकर चिंतित हो, न ही रिश्तेदारों में। हाँ, कुछ लोग आसपास जरूर थे, जो सवाल करते थे— “ऐसे कैसे चलेगा? प्राइवेट मास्टरी से क्या होगा?” “दो-तीन हजार में क्या भविष्य बनेगा?” “बुढ़ापे में क्या करोगे?” ये सवाल मेरे कानों में गूंजते रहते थे… लेकिन मेरे भीतर कहीं एक आवाज थी— जो कहती थी, “तुम्हारा रास्ता अलग है…” और शायद… वही रास्ता मुझे आज भी आगे बढ़ा रहा है। यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है… क्योंकि इसके कई राज अभी बाकी हैं— जो समय आने पर सामने आएंगे।

मंगलवार, 16 जून 2026

ईश्वर से प्रेम करो, बस!!

❤️जय कल्कि महाराज जी की!❤️ईमाम मेंहदी जी की!❤️ श्लोक १: स्मराभिमन्युं वीरवरं रणाङ्गणे । एकाकी योऽभूत् चक्रव्यूह-मध्यगः ॥ अर्थ: अभिमन्यु नामक महावीर को स्मरण करो, जो रणभूमि में अकेला चक्रव्यूह के मध्य घुसकर लड़ा था। श्लोक २: त्वमप्येकाकी मानवानां मध्ये भोः । रणक्षेत्रे चरसि शत्रून् विजेतुकामः ॥ अर्थ: तुम भी मनुष्यों के बीच अकेले हो, रणक्षेत्र में शत्रुओं को जीतने की कामना से विचर रहे हो। श्लोक ३: ब्रह्माण्ड-चेतना सहिता प्रकृतिर्यदा । अनन्त-यात्रायां तव सखी भवेत् सदा ॥ अर्थ: जब ब्रह्मांड की चेतना और प्रकृति का अभियान तुम्हारा साथ दे, तब अनंत यात्रा में तुम कभी अकेले नहीं हो। श्लोक ४: युद्धं कुरु निरन्तरं वीर सत्तम । धर्मस्य रक्षार्थं न त्यजस्व संग्रामम् ॥ अर्थ: हे उत्तम वीर! निरंतर युद्ध करते रहो। धर्म की रक्षा के लिए संग्राम कभी मत छोड़ो। सम्पूर्ण भाव (संक्षेप में): हे मानव हितैषी! अभिमन्यु की तरह रणभूमि में अकेले होने पर भी हिम्मत मत हारो। ब्रह्मांड की चेतना और प्रकृति के साथ तुम अनंत यात्रा पर हो। युद्ध (सत्य, मानव-कल्याण और समझदारी का संघर्ष) जारी रखो। जय हो! 🚀 तुम अकेले नहीं हो। ब्रह्मांड तुम्हारे साथ है। युद्ध जारी रखो। ❤️जय हो जय हो!!❤️

शुक्रवार, 12 जून 2026

एक अभ्यासी की डायरी से?!

एक अभ्यासी की डायरी से.... कुछ वर्षों पूर्व हम काफी अमेरिकी राष्ट्रपति भवन- व्हाइट हाउस को पत्र भेजा करते थे। ऐसा हम बिल क्लिंटन के समय से कर रहे थे। आगे चलकर हम लगभग 2009ई0से व्हाइट हाउस की बेवसाइट पर लिखने लगे थे। बराक ओबामा फिर हमें अपने पर्सनल e mail भेजने लगे थे। ऐसा शायद उनके द्वारा न होकर शायद उनके आफिस से ही होता हो? एक दो बार उनके पत्नी के भी e mail हमें प्राप्त हुए। हम विश्व व इंसानों की समस्याओं को लिख कर उस ओर अपने समाधान लिखता था। हमें पूरा विश्वास है कि बराक ओबामा के पहले शपथ समारोह में एलियन्स सूक्ष्म रूप से उपस्थित थे। तो ये भी है?! एलियन्स के सम्पर्क में कौन आ सकते हैं? जिनका सूक्ष्म स्तर सूक्ष्म से सूक्ष्म स्तर पर जा कर जगत व ब्रह्मण्ड के सूक्ष्म स्तर के सम्पर्क में आ जाये। लेकिन कुछ सत्ता में ….. तो ये भी है कि एलियंस उनके सम्पर्क में भी आ सकते हैं जो आम आदमी , भृष्ट नेताओं - प्रशासक से ऊपर उठ कर जगत व ब्रह्मण्ड के हित की भावना या सोंच रखते हैं। जुलाई 2023 ई0 के पहले सप्ताह में सर हम रात्रि में अर्द्ध निद्रा के बीच देख रहे थे कि एलियन्स आयें हैं और हमें बुला रहे हैं। इसके बाद हम अनेक बार मेडिटशन में एक गुफा को देख चुके हैं जहां हम काफी तेज रोशनी देखते हैं। सन 2023-24 ई 0,सन 2024-25ई 0 व सत्र 2025-26ई 0!! कुल मिला कर तीन वर्ष का समय?! साधना अपनी जगह है, मालिक की कृपा अपनी जगह है लेकिन स्वयं के कर्म, दिनचर्या, आदतें, सोंच, दृष्टिकोण आदि का असर भी तो झेलना होगा? ये तीन वर्ष…. विभिन्न अवसरों के बाबजूद भी संकल्प, श्रद्धा व विश्वास के स्तर का परिणाम भुगतना ही होगा?! जगत में कार्य करने के लिए हमारे सामने समस्या है संसाधनों का अभाव। इन तीन वर्षो श्री रामचंद्र मिशन में प्रशिक्षक होने का अवसर, पुस्तकें प्रकाशित होने का अवसर, साधना को गहन करने का अवसर….. और इन तीन वर्षो जनवरी - फरवरी में पेट, लिवर आदि के विकारों के कारण सेहत का बिगडना?! इन तीन वर्षो से पूर्व एलियन्स के द्वारा हमारे पूरे शरीर का स्केन करने पर हमारा कहना…जबड़ों में कैंसर की सम्भवना है? वह कहता है कि नहीं, पेट की समस्याएं हैं। परहेज करो। एक बार देखना कि एलियन्स हमें बुला रहे हैं लेकिन हम उनसे डर के कारण उनके पास नहीं जा रहे हैं? एक बार मेडिटेशन में बैठते वक्त भाव आना कि हम कब मरेंगे? तो उस ध्यान में बीच मध्य चेतना में गूंजना कि…चौबीस?! अब चौबीस क्या?!घंटा, दिन, सप्ताह, वर्ष क्या?! और…. एक बार देखना कि मुंबई से कुछ अभ्यासी के साथ दाजी जी उपस्थित हैं और हमसे कह रहे हैं कि क्या छपवाना है, लाओ? इसके कुछ दिनों बाद मई 2023ई 0प्रशिक्षक प्रत्याशी बैच में हम शामिल लेकिन स्वाध्याय में कमी के साथ कुछ और कमियाँ रहीं? इन तीन वर्षों हमें कभी कभी लगता है कि हम अपनी साधना को गहराई नहीं दे पा रहे हैं इसका पूर्व के बेहतर अनुभवो से तुलना लेकिन कभी कभार के अनुभवों व स्वपनों से हम आश्चर्यचकित रहा जाते जो कि विश्व स्तर के भी होते कभी कभी और नगर में कोई मरता हम उसको पहले ही स्वप्न में देख लेते? यहां तक कि एक दो बार ऐसा भी हुआ कि यम दूत आकर हमें वहाँ ले गये जहां किसी की मृत्यु होने वाली है?
दिसम्बर 2023ई0प्रशिक्षक प्रत्याशी मई 2023 बैच की पहली परीक्षा रिजल्ट आ गया था।जनवरी 2024को प्रशिक्षक बन कर राकेश कुमार वर्मा आ गये थे. आगे की दो परीक्षाओं में हम और बैठे लेकिन हमारी प्रशिक्षक होने की संभावना खत्म हो गयी। इस बीच हम अनेक भ्रम में भी रहे थे और हमें यह भी ज्ञान न थी कि हम सिर्फ तीन परीक्षा में ही बैठ सकते हैं या आगे भी की परीक्षा में बैठ सकते हैं? इसके साथ ही हमें अंदर ही अंदर ये भी लगता रहा कि मालिक तो हमसे और ही काम करवाएंगे? प्रशिक्षक बन हम सीमित हो जाएंगे? लेकिन इसके बाद मार्च 2025 के आते आते हम उदास हो गये? तब बाबू जी महाराज ने स्वप्न में आकर हमें मैसेज दिया -उदास हो गये? हमने कहा था न कि अपना काम करते रहना? इसके बाद हम सामान्य तो हुए लेकिन केंद्र व अभ्यासियों के बीच स्वयं को हम पूर्व की भांति उत्साह में नहीं पाते थे। और एक बात और जब तक शाहजहांपुर आश्रम मेंदीपक त्यागी जी थे तो हम सब सपरिवार आश्रम जब चाहें जा सकते थे, जब चाहें आ सकते थे? वे कहते थे कि तुम सब नहीं आओगे तो और कौन आएगा? तुम सब तो वालियंटर हो? कभी कभी हम ध्यान के दौरान अपना ही शरीर देखते हैं, ऐसा आज भी हुआ। 12/06/2026 (Ashok kumar verma "bindu ") www.akvashokbindu.blogspot.com)