गुरुवार, 8 जनवरी 2026

आत्मा तंत्र से जुड़ने की दशाएं..?!

आत्मा तन्त्र से जुड़ने या भक्ति की अवस्थाएं... (०१)::'अ', यानी बाहरी जागृत दशा से, (0२)::'उ', यानी आंतरिक स्वप्न जैसी दशा को, (०३)::'म', यानी गहरी निद्रावस्था की दशा 'सुषुप्ति' को (०४)::तुरीयावस्था के निःशब्द मौन को (०५)::और अंततः तुरीयातीत दशा A', meaning from the external awakened state, 'U', meaning to the internal dream-like state, 'M', meaning to the state of deep sleep 'Sushupti' to the silent stillness of the Turiya state and finally to the state beyond Turiya. हम एक ही क्षण में वे सारी चीजें देखते हुए भी शांत बने रहते हैं। योग में इसे तुरीयातीत दशा कहते हैं। जहाँ खुली आँखों के साथ हमारी चेतना 360 डिग्री की हो जाती है। उसमें किसी विशेष वस्तु पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत नहीं रह जाती। जिस क्षण हम एक वस्तु पर केंद्रित होते हैं वह ध्यान की बजाय एकाग्रता हो जाता है। ऊँ एवं न्यूरोसाइंस हम इन विभिन्न अवस्थाओं को योग व न्यूरोसाइंस दोनों ही दृष्टिकोण से समझ सकते हैं। योग में ऊँ सृष्टि के निर्माण के समय से प्रकट मूल ध्वनि है और वह मूल ध्वनि अब भी आत्मा की सहज स्मृति में विद्यमान है। यह शब्द अ (अकार) से शब्द उ (उकार) से होकर म (मकार) और अंततः म के बाद आने वाला खालीपन है। यह म के बाद आने वाली ध्वनिरहित ध्वनि है जो हमें अनिवार्यतः ग्रहण करना चाहिए। ये शब्द और इसके बाद आने वाला निःशब्द अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि ॐ शब्द के बाद आने वाला खाली मौन हमें चौथी अवस्था अर्थात् तुरीय की याद दिलाता है। चेतना की ये दशाएँ हम सभी प्रतिदिन अनुभव करते हैं और इन्हें 'ईईजी' मशीन पर मापा जा सकता है। सजग, जागृत दशाएँ उच्चतर आवृत्ति की मानसिक तरंग के रूप में पहचानी जाती हैं: (०१)गामा तरंगें - 31-120 हर्ट्ज, तब बनती हैं जब हम सीखने और समस्या हल करने की गतिविधियों में सक्रिय होते हैं। (०२)बीटा तरंगे : 13-30 हर्ट्ज, तब होती हैं जब हम बातचीत और अन्य गतिविधियों में सक्रिय होते हैं। (०३)अल्फा तरंगें - 8-12 हर्ट्ज, तब बनती है जब हम तनावमुक्त, मननपूर्ण, खूबसूरत संगीत में डूबे हुए हों या ध्यान करना शुरू कर रहे होते हैं। (०४)स्वप्न की दशा थीटा तरंगों से पहचानी जाती है- 4-7 हर्ट्ज, और तब बनती है जब हम नींद महसूस कर रहे हों और सुप्तावस्था या सपनो में जा रहे हों। (०५)गहरी निद्रावस्था डेल्टा तरंगों 0.5-3 हर्ट्ज से पहचानी जाती हैं। जागृत अवस्था में चेतना बाहर की ओर स्रोत से दूर ज्ञान की खोज में जा रही होती है जिससे आधुनिक विज्ञान का क्षेत्र उत्पन्न हुआ है। जब मानसिक तरंगों की. पुस्तक ::नियति का निर्माण पाठ 08:: ध्यान ,योग एवं न्यूरोसाइंस लेखक : कमलेश डी पटेल #दाजी

शुक्रवार, 16 मई 2025

श्रीमद्भगवद्गीता की वर्तमान में प्रासंगिकता ?!

श्रीमद्भागद्वगीता का विश्व व्यापी अध्ययन से पता चलता है कि हांगकांग में गीता के आधार पर मैनेजमेंट का सेलेब्स तैयार किया गया है। अमेरिका की एक विशेष सैन्य टीम को गीता का अध्ययन अनिवार्य है ।उस टीम के ही सैनिकों ने ओसामा बिन लादेन आतंकवादी को मारा।आज से ढाई हजार वर्ष पहले दुनिया के सन्तों को यही ग्रन्थ आकर्षित करता था। जब सिकन्दर अपने विश्व विजेता बनने के आखिरी पड़ाव में भारत की ओर आया और आने से पहले अपने गुरु अरस्तु से मिला तो अरस्तु ने कहा -हमने तो तुझे विश्व विजेता बनने की तेरी महत्वाकांक्षी योजना का विरोध किया था।जब तू नहीं माना तो हमने कहा था कि इसकी शुरुआत तू पूर्व से कर लेकिन तूने नहीं कि अब तू पूर्व जा रहा है तो मेरे लिए एक गीता पुस्तक व एक साधु लेते आना। उस समय गीता विश्व में महत्वपूर्ण स्थान रखती थी। श्रीमद्भगवद्गीता की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है जितनी प्राचीन काल में थी, क्योंकि यह जीवन के मूलभूत प्रश्नों, नैतिकता, कर्तव्य, और आत्म-साक्षात्कार पर गहन दार्शनिक और व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करती है। इसका महत्व निम्नलिखित बिंदुओं में देखा जा सकता है:नैतिक और कर्तव्यपरक मार्गदर्शन: गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग के माध्यम से निष्काम कर्म (बिना फल की इच्छा के कर्तव्य पालन) का उपदेश देते हैं। यह आज के समय में भी प्रासंगिक है, जब लोग व्यक्तिगत लाभ और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन खोजते हैं। उदाहरण के लिए, कार्यस्थल पर ईमानदारी और समर्पण जैसे मूल्य गीता से प्रेरित हो सकते हैं।मन का नियंत्रण और मानसिक शांति: गीता में ध्यान, आत्म-नियंत्रण, और समभाव (स्थितप्रज्ञता) पर जोर दिया गया है। आधुनिक जीवन की तनावपूर्ण और प्रतिस्पर्धी प्रकृति में, यह मन को शांत रखने और सही निर्णय लेने में मदद करती है। योग और माइंडफुलनेस की अवधारणाएँ गीता के ज्ञानयोग और ध्यानयोग से जुड़ी हैं।आध्यात्मिक और दार्शनिक गहराई: गीता विभिन्न योगों (कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, और ध्यानयोग) के माध्यम से जीवन के उद्देश्य और आत्मा की अमरता को समझाती है। यह व्यक्ति को यह समझने में मदद करती है कि सच्चा सुख भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आत्म-जागरूकता और ईश्वर से एकता में है। यह आज के भौतिकवादी युग में विशेष रूप से प्रासंगिक है।सामाजिक और वैश्विक सद्भाव: गीता सभी प्राणियों के प्रति करुणा, समानता, और प्रेम का संदेश देती है। यह सामाजिक समरसता और वैश्विक एकता को बढ़ावा देती है, जो आज के विभाजित विश्व में अत्यंत आवश्यक है।संकटों का सामना: अर्जुन की तरह, जो युद्ध के मैदान में नैतिक और भावनात्मक संकट का सामना करता है, गीता हमें जीवन के कठिन क्षणों में धैर्य, साहस, और सही मार्ग चुनने की प्रेरणा देती है। यह व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में निर्णय लेने में सहायक है।वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक प्रासंगिकता: गीता के कई सिद्धांत, जैसे कर्म और मन के नियंत्रण, आधुनिक मनोविज्ञान और व्यवहार विज्ञान से मेल खाते हैं। उदाहरण के लिए, "कर्म कर, फल की चिंता मत कर" का सिद्धांत तनाव प्रबंधन और उत्पादकता बढ़ाने में सहायक है।निष्कर्ष: गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक जीवन दर्शन है, जो समय, स्थान, और संस्कृति की सीमाओं से परे है। यह व्यक्तिगत विकास, सामाजिक कल्याण, और आध्यात्मिक उन्नति के लिए एक शाश्वत मार्गदर्शक है। चाहे कोई किसी भी पृष्ठभूमि का हो, गीता के उपदेश जीवन को अर्थपूर्ण और संतुलित बनाने में सहायता करते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता की वर्तमान में प्रसंगिकता ?! वर्तमान में मानव, मानव समाज, देश व विश्व में अनेक समस्याएं है जिनका समाधान हमें श्रीमद्भगवद्गीता में मिलता है। धर्म का मतलब यह नहीं है कि जाति-मजहब ,देश में मानवता,बंधुत्व व अपने संघर्ष को सीमित कर देना। वरन धर्म का मतलब है -अत्याचार, शोषण, अपराध, अन्याय आदि के खिलाफ संघर्ष करना। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि दुनिया के धर्मों को त्याग मेरे शरण में आ । इसका मतलब है कि उस वक्त अर्जुन के लिए उसके जीवन में महापुरुष थे श्रीकृष्ण। जब अर्जुन श्री कृष्ण से मदद मांगने द्वारिका गये थे तो उन्होंने श्री कृष्ण को ही उनसे मांगा था। ऐसे में हमारे लिए वर्तमान में हमारे जो महापुरुष हैं हमें दुनिया के धर्मों को त्याग उनके शरण में जाना ही चाहिए।वर्तमान में जिससे हम आगे बढ़ सकते हैं, हमें उनके शरण में रहना ही चाहिए। इसी तरह श्रीकृष्ण कहते हैं कि तू भूतों को भेजेगा तो भूतों को प्राप्त होगा, पितरों को भेजेगा तो पितरों को प्राप्त होगा, देवों को भेजेगा तो देवों को प्राप्त होगा लेकिन हमें भजेगा तो हमें प्राप्त होगा।हमारी नजर में इसका मतलब है कि हमारे जिंदा रहते हमारे समीप जो जीवंत महापुरुष हैं हम उनको भजें अर्थात उनके सन्देशों के आधार पर हम अपना नजरिया, भाव व सोंच बना कर कर्म करें।

शुक्रवार, 13 सितंबर 2024

सर्वव्याप्त प्राण शक्ति में लय होने को वो ही सिर्फ सहयोगी!!

विश्वदानीं सुमनस: स्याम पश्येम नु सूर्यमुच्चरन्तम् । तथा करत् वसुपतिर्वसूनां देवां ओहान: अवसा आगमिष्ठ: ।। अर्थात : (विश्वदानीं सुमनस: स्याम) सदा ही हम उत्तम विचार करने वाले हों। (सूर्य उच्चरन्त पश्येम नु ) आकाश में ऊपर संचार करने वाले सूर्य को हम देखें । (वसूनाम् वसुपति: तथा करत् ) घनों का घनपति देव वैसा प्रयत्न करें कि जिससे (देवान् ओहान: अवसा आगमिश्ठ: ) ज्ञानियों को बुलाने वाला देव आपनी रक्षण की शक्ति से हमारे पास आ जाए। (ऋग्वेद : 6.52.5)
👍अशोकबिन्दु के विचार !👌 जो हमारे अंदर बाहर, सर्वत्र अंतर्निहित है हम सदा उसकेउत्तम विचार में रहें।उसी से हम स्वस्थ हैं देह से अर्थात स्व में स्थित हैं अर्थात स्व में स्थित दशा के अहसास में हम सदा रहें जो ही वास्तव में जीवन है।उसके बिना ये देह तो देहान्त है। पंच तत्वों में एक है आकाश तत्व जिसमें हमारी आत्मा रूपी सूरज प्रकाशित है जैसे कि इस आकाश में सूरज को हम देखें वैसे ही हम अपने अंदर के आकाश तत्व में सन्देशों व अहसास रूपी ज्ञान व आत्मा रूपी सूरज को देखें। सर्वव्याप्त सघन चेतना जैसे कि सागर की गतिशीलता और उस गतिशीलता में हमसे आगे जो स्थिति को समझने व नियंत्रित करने वाले हम पर वैसा प्रयत्न करें जो ज्ञानियों, ज्ञान प्रेमियों को बुलाने वाले ,उनसे प्रेम करने वाले अपने रक्षण शक्ति, प्राण शक्ति या प्राणाहुति से हमारे समीप आयें या वे हमारे समीप रहें। चेतना के सागर में जैसे उच्च लहरें छोटी छोटी लहरों ,बूंदों को अपने में समेट लें। एक शिक्षक, ऋषि, वसु,ईश्वर ज्ञान प्रेमी या अपने प्रेमी पर ही विशेष कृपा बरसाता है।

सोमवार, 1 जुलाई 2024

अशोकबिन्दु : दैट इज ..?!

01 जुलाई 2024 ई0!!👌 सोमवार !!👌 अशोक कुमार वर्मा ' बिंदु ' की एक और पुस्तक का लोकार्पण ♥️ कटरा /बीसलपुर /पीलीभीत /शाहजह *Watch Breaking News on Shuru App* https://shuru.page.link/xZRBrATki6aSwrQh7 अमेजान पर हम !! रुहेलखंड क्षेत्र से एक आगाज !! अशोक कुमार वर्मा ' बिंदु ' की लेखनी व आवाज !! योग : यानि कि …!? / Yog : yaani ki ? https://amzn.in/d/0doTf1ZG अशोकबिन्दु :: दैट इज..?! https://amzn.in/d/6vkrHz9 ऐतिहासिक सूक्ष्मवाद !! एक भविष्य कथांश https://amzn.eu/d/axllwIV बुजुर्ग / Bujurg https://amzn.in/d/6zwqn7N अग्निनाश ! / Aganinaash https://amzn.eu/d/3yYPtAZ जाम - ए -हुलास नगरा https://amzn.eu/d/aqXJx2G शिक्षा / Shiksha https://amzn.eu/d/7LuaZHl लव जेहाद / Love Jehaad https://amzn.eu/d/02YuFmH स्त्रैण आँसुओं के सागर से! https://amzn.eu/d/d9HgS9I ❤️❤️❤️____________________________❤️❤️❤️ www.ashokbindu.blogspot.com www.akvashokbindu.blogspot.com

रविवार, 23 जून 2024

सबसे बड़ी समाज सेवा : शांति!!

विश्व शांति इसलिए यह अति आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर शांति और संतुष्टि की स्थिति विकसित करने के साधनों का पता लगाया जाए। इस प्रकार, विश्व शांति की प्राप्ति के लिए हमें यह करना है कि, व्यक्तिगत रूप से लोगों की मानसिक प्रवृत्तियों को बदला जाए। इसका मतलब है कि दिमाग का उचित नियमन ताकि इसे संयम की स्थिति में पेश किया जा सके। दुनिया में शांति लाने का यही एकमात्र तरीका है। इसलिए हम सभी को अपने भीतर मन की शांति विकसित करना आवश्यक है। लेकिन यह विशेष रूप से आध्यात्मिकता का दायरा है, इस उद्देश्य के लिए हम सबको आवश्यक रूप से आध्यात्मिक साधनों का सहारा लेना चाहिए। विश्व शांति, पूज्य बाबू जी🌿💐

शुक्रवार, 15 मार्च 2024

सपने साकार होने की ओर!!

14-17 मार्च 2024 : विश्व आध्यत्म सम्मेलन 2024 ई0! किशोरावस्था से मेरा ख्वाब था सभी सभी रूहानी आंदोलनों को एक मंच पर देखना। इसके साथ ही विश्व सरकार, विश्व सरकार ग्रन्थ साहिब की स्थापना। जब बसुधैब कुटुम्बकम तो किससे नफरत किससे मोहब्बत!? गीता में भी श्रीकृष्ण कहते हैं कि दुनिया के धर्म छोंड़ मेरी शरण
में आ। अर्थात जीवंत महापुरुष को स्वीकार। अतीत में जो महापुरुष हुए, अवतार हुए उन्हें भी उस वक्त के महापुरुषों को स्वीकार करना पड़ा। मनुष्य प्रकृति अभियान का अंग है। प्रकृति अभियान में ही सहयोगी होना होगा। प्रकृति अभियान, मानवता ,रूहानी आंदोलन का कोई मजहब नहीं कोई जाति नहीं, कोई देश नहीं वरन बसुधैब कुटुम्बकम।

रविवार, 4 जून 2023

हमारे सहज मार्ग में मानसिक सफाई :अशोकबिन्दु

सफाई::अतीत से मुक्ति!!आत्मिक वर्तमान से जुड़ाव की तैयारी। ---------------------------------------------------
आरामदायक स्थिति में बैठ जाएं! और मन में भाव लाएं कि पहले के इकठ्ठे विकार, अशुद्धियां, छापें आदि हटायी जा रही हैं। आंखें बंद करें और स्वयं को ढीला छोंड़ दें। अपने मन में अब भाव लाएं कि सारी जटिलताएं और अशुद्धियां आपके शरीर से बाहर को जा रही हैं। अपने सिर के पिछले हिस्से व पीठ पर ध्यान दें। महसूस करें अपने सिर के पिछले हिस्से व पीठ को। सिर से नीचे होते हुए पीठ से गुजरते हुए सारे विकार, अशुद्धियां व जटिलताएं धुआं बन कर कमर के नीचे से बाहर जा रही हैं। बार बार यही। ऐसा बार बार हो रहा है।हमारे सारे विकार,अशुद्धियां व जटिलताएं धुआं बन कर बाहर जा रही हैं। ये प्रक्रिया तेज हो रही है। तेज और तेज! और तेज!! सिर के पीछे व पीठ को ध्यान में रखते हुए मन में भाव रखें - सारे विकार, अशुद्धियां व जटिलताएं धुआं बन कर बाहर जा रही हैं। ये कार्य अब तेजी के साथ होने लगा है। बड़ी तेजी से, बहुत ही तेजी से। और तेजी से । बहुत ही तेजी से हमारे अंदर के सारे विकार, अशुद्धियां, जटिलताएं धुआं बन कर बाहर जा रहे हैं। अपने आत्मविश्वास एवं संकल्प शक्ति के साथ इस प्रक्रिया को तेज करें। तेज और तेज। बड़ी तेजी के साथ हमारे अंदर के विकार, अशुद्धियां, जटिलताएं धुआं बन कर बाहर जा रही हैं। यदि आपका ध्यान भटकता है और अन्य विचार मन में आतें है तो धीमे से फिर से सफाई की ओर ध्यान दें कि हमारे अंदर के सारे विकार, अशुद्धियां, जटिलताएं धुंआ बन कर बाहर जा रहे हैं। इसे बीस तीस मिनट तक करें। हमारा मन, हृदय व शरीर अब हल्का होने लगा है। जब हल्कापन महसूस हो तो सफाई पूर्ण समझें। इसके बाद भाव लाएं कि अंतरिक्ष में तारों, प्रकाशीय तरंगों के बीच से किसी छोर से दुधिया रंग की एक पवित्र धारा हमारे अंदर प्रवेश कर रही है। शेष बची अशुद्धियां, जटिलताएं, विकार को वह बाहर ले जा रही है। अंदर दिव्य प्रकाश, बाहर दिव्य प्रकाश! अंतरिक्ष के किसी छोर से आता दिव्य दूधिया प्रकाश हमारे अंदर प्रवेश कर हमारे रोम रोम को पवित्र कर रहा है।बची खुची जटिलताएं, अशुद्धियां, विकार बाहर जा रहे हैं। अब हम सभी जटिलताओं, अशुद्धियों, विकारों से मुक्त हो चुके हैं। अंदर बाहर प्रकाश ही प्रकाश। दिल ! दिल में दिव्य प्रकाश।दिल में दिव्य प्रकाश मौजूद है।