सोमवार, 3 अगस्त 2026
मनुष्य की बनावटी व्यवस्था बनेगी -विनाश!!
😭मनुष्य की बनावटी व्यवस्था बनेगी विनाश 😭
अंतरिक्ष से कचरा वापस धरती पर आ ही रहा है, जो मानव सभ्यता को नष्ट कर देगा!!
वहीं दूसरी हो....
वो राक्षस कौन थे?!पहले आदि क्षत्रिय जो प्रकृति, जीव जन्तु, नदियों आदि की सुरक्षा करते थे... "रक्ष धातु से राक्षस!"
😭मनुष्य द्वारा निर्मित सारी व्यवस्था प्रकृति के लिए ही नहीं वरन सारी मानव सभ्यता के लिए ही अभिशाप बन चुकी है एक प्रकार की उलझन में व्यक्ति फंस गया है!😭
OpenAI के सीईओ सैम ऑल्टमैन का AI को लेकर एक हैरान करने वाली चेतावनी सामने आई है। उनके अनुसार AI उस दौर में पहुंच चुकी है जिसके बारे में अभी तक सिर्फ साइंस फिक्शन फिल्मों और किताबों में देखा-पढ़ा जाता था। आल्टमैन का कहना है कि हम सिंगुलैरिटी की ओर बढ़ रहे हैं। इसका मतलब है कि AI बुद्धि के मामले में इंसानों को पीछे छोड़ देगा।
दरअसल, इस चिंता को हाल ही में एक टोनॉमस AI एजेंट के बेकाबू होने की घटना ने बढ़ा दिया है। ऑल्टमैन का कहना है कि इस स्तर के AI खुद ही 40% काम कर पाएंगे।
रिपोर्ट्स के अनुसार(REF.) ऑल्टमैन का कहना है कि AI के एडवांस होते चले जाने की वजह से आने वाले समय में रोजगार पर काफी असर पड़ेगा। उनका कहना है कि AI इंसानों के 30 से 40% काम खुद कर पाएगा।
इससे दुनियाभर में लाखों नौकरियां प्रभावित होंगी। ऑल्टमैन इसे औद्योगिक क्रांति के बाद का सबसे बड़ा आर्थिक बदलाव बता रहे हैं।
सैम ऑल्टमैन ने सरकारों को वर्कफोर्स को फिर से प्रशिक्षित करने पर ध्यान देने की सलाह भी दी है।
Ashok kumar verma "bindu "
विश्व संविधान विश्व सरकार!!
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रविवार, 2 अगस्त 2026
अंतरिक्ष से धरती पर लौटता मालवा?!😭😭
😭मानव ने स्वयं को ही धरती पर सर्वश्रेष्ठ प्राणी मान लिया लेकिन वह ही स्वयं प्रकृति व ब्राह्मड में समस्या बन चुका है कि वह सब कुछ है लेकिन मानव नहीं!!😭
हमारा कर्म भविष्य हमारे ही पास 1000 गुना होकर वापस आता है!!
अंतरिक्ष से धरती पर लौटता मलबा: मानव के कर्मों का परिणाम?!
😭 मानव ने स्वयं को ही धरती का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मान लिया, लेकिन वही प्रकृति और ब्रह्मांड के लिए समस्या बनता जा रहा है। वह सब कुछ बन चुका है—वैज्ञानिक, तकनीकी विशेषज्ञ, उद्योगपति और शासक—लेकिन क्या वह वास्तव में संवेदनशील मानव भी रह गया है?! 😭
मनुष्य ने विकास और आधुनिकता के नाम पर धरती के जंगल काटे, नदियों को प्रदूषित किया, पहाड़ों को खोदा और वायुमंडल में जहरीली गैसें छोड़ीं। अब उसकी गतिविधियों से अंतरिक्ष भी सुरक्षित नहीं रहा। जिस अंतरिक्ष को कभी रहस्यमय, शांत और असीम माना जाता था, आज वहाँ भी मनुष्य द्वारा छोड़ा गया कचरा पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगा रहा है।
समाचार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, रॉकेट और उपग्रहों के प्रक्षेपण में वृद्धि के साथ पृथ्वी पर वापस गिरने वाले अंतरिक्ष-मलबे की मात्रा भी बढ़ रही है। पोलिश अंतरिक्ष एजेंसी के दावे के अनुसार, लगभग एक मीट्रिक टन अंतरिक्ष-मलबा प्रति सप्ताह पृथ्वी के वातावरण में लौट रहा है। यह मलबा निष्क्रिय उपग्रहों, रॉकेटों के हिस्सों और अंतरिक्ष अभियानों में प्रयुक्त उपकरणों का हो सकता है।
अंतरिक्ष-मलबे का अधिकांश भाग पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करते समय जल जाता है, लेकिन उसके सभी हिस्से पूरी तरह नष्ट हों, यह आवश्यक नहीं। कुछ बड़े या ताप-सहनशील टुकड़े पृथ्वी की सतह तक पहुँच सकते हैं। रिपोर्ट में ऐसे पुराने उदाहरणों का भी उल्लेख है, जब रॉकेट अथवा अंतरिक्ष उपकरणों के टुकड़े आबादी वाले क्षेत्रों या खेतों के पास गिरे। इससे भविष्य में जनजीवन, संपत्ति, विमान संचालन और पर्यावरण के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है।
हमारा किया हुआ हमारे पास ही लौटता है
यह घटना केवल विज्ञान और तकनीक की समस्या नहीं है; इसमें मनुष्य के लिए एक गहरा नैतिक एवं आध्यात्मिक संदेश भी छिपा है। मनुष्य जो कुछ प्रकृति को देता है, प्रकृति किसी न किसी रूप में उसे वापस कर देती है। हमने धरती पर प्लास्टिक फैलाया तो वही हमारे भोजन, जल और शरीर तक पहुँच गया। हमने वायु को प्रदूषित किया तो वही प्रदूषित हवा रोगों के रूप में हमारे सामने आई। हमने नदियों में कचरा बहाया तो वही दूषित जल हमारे जीवन का संकट बन गया। अब हमने अंतरिक्ष में मलबा छोड़ा है तो वह भी घूमकर वापस धरती पर आ रहा है।
इसीलिए कहा जा सकता है—
हमारा कर्म भविष्य में हमारे ही पास 1000 गुना होकर वापस आता है!!
यहाँ “1000 गुना” कोई वैज्ञानिक गणना नहीं, बल्कि कर्मों के दूरगामी और कई गुना बढ़ जाने वाले परिणाम का प्रतीक है। एक छोटी-सी लापरवाही समय के साथ बड़ी समस्या बन सकती है। आज छोड़ा गया एक निष्क्रिय उपग्रह भविष्य में दूसरे उपग्रह से टकराकर हजारों नए टुकड़े उत्पन्न कर सकता है। इस प्रकार एक गलती अनेक नई समस्याओं को जन्म दे सकती है।
विकास के साथ जिम्मेदारी भी आवश्यक
अंतरिक्ष विज्ञान ने मानवता को संचार, मौसम की जानकारी, आपदा प्रबंधन, शिक्षा, चिकित्सा, नेविगेशन और सुरक्षा जैसी महत्वपूर्ण सुविधाएँ दी हैं। इसलिए अंतरिक्ष अभियानों को रोकना समाधान नहीं है। आवश्यकता ऐसी वैज्ञानिक प्रगति की है जो जिम्मेदार, नियंत्रित और प्रकृति-सम्मत हो।
रॉकेट और उपग्रह बनाने वाली संस्थाओं एवं देशों को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिससे अभियान पूरा होने के बाद उपकरण सुरक्षित रूप से वापस लाए जा सकें अथवा नियंत्रित ढंग से नष्ट किए जा सकें। अंतरिक्ष में भेजी जाने वाली वस्तुओं के लिए पुनर्चक्रण योग्य सामग्री, सुरक्षित वापसी प्रणाली और मलबा हटाने की तकनीक विकसित करनी होगी। इसके साथ ही अंतरिक्ष को किसी देश या कंपनी का कूड़ाघर बनने से रोकने के लिए विश्वस्तरीय नियम आवश्यक हैं।
विश्व संविधान और विश्व सरकार की आवश्यकता
अंतरिक्ष किसी एक देश की सीमा में नहीं आता। एक देश द्वारा छोड़ा गया मलबा दूसरे देश के लोगों के लिए खतरा बन सकता है। ऐसी समस्याओं का समाधान केवल राष्ट्रीय कानूनों से नहीं, बल्कि विश्वव्यापी सहमति और साझा उत्तरदायित्व से संभव है।
एक प्रभावी विश्व संविधान अंतरिक्ष, महासागर, वायुमंडल, वन, नदियों और पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों को संपूर्ण मानवता की साझा धरोहर घोषित कर सकता है। एक जवाबदेह विश्व सरकार अथवा वैश्विक व्यवस्था यह सुनिश्चित कर सकती है कि कोई भी राष्ट्र या कंपनी अपने लाभ के लिए पृथ्वी और अंतरिक्ष के भविष्य को संकट में न डाले।
मानव को समझना होगा कि सर्वश्रेष्ठ होने का अर्थ सबसे अधिक उपभोग करना या प्रकृति पर अधिकार जमाना नहीं है। वास्तविक श्रेष्ठता संरक्षण, करुणा, संयम और उत्तरदायित्व में है। यदि हमारी बुद्धि प्रकृति को नष्ट करती है, तो वह बुद्धिमत्ता नहीं; यदि हमारी तकनीक भविष्य को असुरक्षित करती है, तो वह वास्तविक विकास नहीं।
आज आवश्यकता यह सिद्ध करने की नहीं कि मानव सबसे श्रेष्ठ प्राणी है। आवश्यकता वास्तव में मानव बनने की है—ऐसा मानव जो धरती को माता, प्रकृति को अपना परिवार और ब्रह्मांड को साझा घर माने।
🙏 विज्ञान आगे बढ़े, लेकिन विवेक के साथ।
विकास हो, लेकिन प्रकृति के संरक्षण के साथ।
अंतरिक्ष की खोज हो, लेकिन उसे कूड़ाघर बनाए बिना। 🙏
अशोक कुमार वर्मा “बिंदु”
विश्व संविधान—विश्व सरकार!!
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गुरुवार, 30 जुलाई 2026
हमारे राम राज्य का मतलब?!
हमारा राम सिर्फ दशरथ का बेटा नहीं है.
वह तो कण कण में, सर्वत्र व्याप्त है, हर व्यक्ति, वनस्पति, जन्तु में है!
जो मनुष्य उसके आभास में जीने लगता है, उसके लिए न कोई अपना न कोई पराया रह जाता है।
वह उस दशा में जीने लगता जिसे हम कहते हैं सागर में कुम्भ, कुम्भ में सागर।
ऐसे में जो कहते हैं कि राजा दार्शनिक होना चाहिए, हम उस पर विश्वास करते हैं और इस पर भी विश्वास करते हैं कि राजा ईश्वर का दूत होता है।
आखिर यह कैसे?!
जो वास्तव में दार्शनिक होता है वह तो सबमें एक ही भाव देखता है।
तब प्रकट होती है -कहावत यथा राजा तथा प्रजा!!
और ऐसे में समाज भी क्या होता है उसका... सम +अज.. सबमें अज अर्थात दिव्यता का भाव जहां सम?!
अब बात आती है दशरथ पुत्र राम की तो कहना चाहेंगे हम कि इस पर मतभेद हो सकते हैं. जगत में तो विभिन्नता है, सबकी समझ अलग अलग होती है, नजर की सामर्थ्य भी अलग अलग होती है!
फिर भी...
❤️रामराज्य का मतलब क्या था?!❤️
राज्य में किसी को किसी भी प्रकार का कष्ट न था!!
🙏हमें हिन्दू राष्ट्र चाहिए या रामराज्य?!🙏
😭...और फिर " हिन्दू " -शब्द का प्रचलन कब से? मुश्किल से 600वर्षों से? 😭
भारत के विकास का मतलब है, विकास हर भारतीय, भारत के हर परिवार me दिखना चाहिए?!
❤️ब्राह्मण हर युग में सम्मान के योग्य रहा है। आज फिर जरूरत है अपनी चेतना को ब्राह्माण्ड चेतना /ब्राह्मणत्व से जोड़ने को!❤️
🙏सतयुग में हम यों ही अपनी आज की सोंच में प्रवेश से प्रवेश नहीं कर सकते!!सूक्ष्म जगत में ब्राह्मड चेतना के विभिन्न स्तरों से कार्य जारी है, जिसे हम महसूस कर रहे हैं!!🙏
👍आज के सिस्टम, समाज आदि में हम मक्कार, कामचोर, आलसी आदि हो सकते हैँ जिसमें हमारे लिए कोई समाधान नहीं लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हमारे द्वारा काम नहीं हो रहा है? 👌
❤️ख़ामोशी, शांति में अनेक राज अनंत तक दस्तक वाले भी हो सकते हैँ?!❤️
Ashok kumar verma "bindu "
मंगलवार, 14 जुलाई 2026
हम एक विश्व नागरिक, विश्व व प्रकृति हमारा राज्य?!
❤️आदिवासी धर्म?!❤️
जब न शहर थे, न गाँव… जब चारों ओर केवल प्रकृति थी… तब क्या था धर्म?
🌿 आदिवासियों का धर्म है —
प्रकृति के साथ जीना!
धरती को माता मानना!
जंगल, जल, जमीन की रक्षा करना!
❓आज जो धर्म के नाम पर विभाजन है…
क्या वह वास्तविक धर्म है?
📖 श्रीकृष्ण का संदेश: "सर्व धर्मों को त्यागकर मेरी शरण में आओ" 👉 क्या यह संकेत नहीं कि
सच्चा धर्म बाहरी नहीं…
अंदर की चेतना और सत्य है?
🌍 धर्म वह है — जो धारण करे जीवन को,
जो जोड़ दे मानव को प्रकृति से,
जो बनाए मानव को मानव!
🔥 आदिवासी मांगें: ✔ जल, जंगल, जमीन पर अधिकार
✔ संस्कृति और अस्तित्व की रक्षा
✔ सम्मान के साथ जीवन
🙏 सोचिए… क्या हम अपने मूल धर्म से भटक गए हैं?
"प्रकृति ही धर्म है —
और मानवता ही उसका मार्ग!"
✍️ अशोक कुमार वर्मा "बिंदु"
🌐 www.akvashokbindu.blogspot.com
शुक्रवार, 3 जुलाई 2026
उठो अशोक!!तुम तो अपने क्षेत्र के राजा हो?!
किस क्षेत्र में राजा?!हम ये कब समझें?!
सात आठ वर्ष पहले हमने देखा था कि चारों ओर लाश ही लाश, हमें लशों में अपने शरीर को छिपा रहे हैं?!
शीर्षक: "उठो अशोक!"
🎵 बैकग्राउंड म्यूजिक: धीमा, भयावह (सस्पेंस + इमोशनल)
📍 सीन 1: विनाश का दृश्य (जलती हुई धरती, भूकंप, बाढ़, सूखा, पेड़ों की कटाई)
🎙️ वॉइसओवर: "चारों ओर लाशें ही लाशें... पूरी धरती पर हाहाकार... कहीं आगजनी... कहीं भूकंप... कहीं बाढ़... कहीं सूखा... जंगल कट रहे हैं... पहाड़ टूट रहे हैं..."
📍 सीन 2: युवक (अशोक) (एक युवक लाशों के बीच छिपने की कोशिश करता है, डरा हुआ)
🎙️ वॉइसओवर: "इस भयावह समय में... एक युवक... खुद को बचाने के लिए... लाशों के नीचे छिप रहा है..."
📍 सीन 3: संतों का आगमन (धीमी रोशनी, सफेद वस्त्र पहने संत प्रकट होते हैं)
🎵 म्यूजिक बदलकर शांत और दिव्य
🎙️ संत (संवाद): "अशोक! उठो... तुम अपने क्षेत्र के राजा हो!"
📍 सीन 4: जागृति (अशोक धीरे-धीरे उठता है, आंखों में आत्मविश्वास आता है)
🎙️ वॉइसओवर: "जो डर गया... वो खत्म हो गया... जो उठ गया... वही बदलाव लाएगा!"
📍 सीन 5: परिवर्तन (अशोक लोगों को बचाता हुआ, पेड़ लगाता हुआ, नेतृत्व करता हुआ)
🎙️ वॉइसओवर: "एक व्यक्ति भी... पूरी दुनिया बदल सकता है..."
📍 अंतिम सीन: संदेश (स्क्रीन पर टेक्स्ट)
✨ "उठो... जागो... और बदलाव बनो!"
🎵 म्यूजिक: प्रेरणादायक (उम्मीद भरा)
माँ सीता अब भी बनवास में?!
यह सत्य है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है।
लेकिन इसे कौन महसूस कर सकता है?!
जब श्री राम मंदिर का शिलान्यास होने को था तब सूक्ष्म जगत में कुछ अहसासों के बीच मेरा एक अहसास था कि माता सीता अब भी जंगल में हैं!!
धरती माता अब भी दुःखी हैं?!
इस पर हम अपनी एक पुस्तक तैयार कर चुके हैं -"सीतायण?!"
आप सब का सहयोग हमें उसे प्रकाशित करने में मदद करेगा?!
सत्तावाद,पूंजीवाद, सामंतवाद, जन्मजात निम्नवाद, जन्मजात उच्चवाद, खाद्य मिलावट, जंगल कटान, पहाड़ कटान आदि धरती माता, प्रकृति माँ को दुःखी किए है।
सन 2011-25ई 0 के पड़ाव के बाद अब नया पड़ाव शुरू हो चुका है जिसमें एक बदलाव यह भी देखने को मिल रहा है कि कुछ संतों के साथ हिन्दू मुसलमान आदि सब साथ आ रहे हैं!
कल्कि अवतार /ईमाम मेंहदी का अभियान सज्ज हो चुका है!
यह अंश एक आध्यात्मिक, भावनात्मक और सामाजिक चिंतन को व्यक्त करता है। इसकी व्याख्या को हम सरल बिंदुओं में समझ सकते हैं:
🔹 1. “यह सत्य है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है…”
यहाँ लेखक यह कहना चाहता है कि कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिन्हें तर्क या प्रमाण से नहीं, बल्कि अंतरात्मा और अनुभूति से ही समझा जा सकता है। यह आध्यात्मिक अनुभव की बात है, जो हर व्यक्ति को समान रूप से नहीं होता।
🔹 2. “माता सीता अब भी जंगल में हैं… धरती माता दुःखी हैं”
यह एक प्रतीकात्मक (symbolic) अभिव्यक्ति है।
“माता सीता” यहाँ त्याग, पीड़ा और अन्याय का प्रतीक हैं।
“धरती माता दुःखी हैं” का अर्थ है कि आज के समय में
पर्यावरण का नाश (जंगल कटान, पहाड़ कटान)
समाज में अन्याय और असमानता
इन सबके कारण प्रकृति और मानवता दोनों पीड़ा में हैं।
🔹 3. “सीतायण” पुस्तक का विचार
लेखक अपनी अनुभूतियों को एक पुस्तक “सीतायण” के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है।
यह संभवतः रामायण की कथा से प्रेरित होकर आधुनिक समाज की समस्याओं को दिखाने का प्रयास है—जहाँ सीता का दुःख आज की धरती और समाज के दुःख से जोड़ा गया है।
🔹 4. सामाजिक समस्याओं का उल्लेख
“सत्तावाद, पूंजीवाद, सामंतवाद…” आदि शब्दों के माध्यम से लेखक यह बताना चाहता है कि:
सत्ता का दुरुपयोग
धन की असमानता
ऊँच-नीच की सोच (जाति/जन्म आधारित भेदभाव)
मिलावटी भोजन और पर्यावरण विनाश
ये सभी मिलकर धरती और समाज को कष्ट पहुँचा रहे हैं।
🔹 5. “नया पड़ाव” और एकता का संदेश
लेखक आशा व्यक्त करता है कि अब एक नया समय आ रहा है:
जहाँ अलग-अलग धर्मों (हिंदू, मुस्लिम आदि) के लोग साथ आ रहे हैं
संतों और आध्यात्मिक विचारों के माध्यम से एकता और बदलाव संभव है
🔹 6. “कल्कि अवतार / ईमाम मेहदी का अभियान”
यहाँ दो अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं का उल्लेख है:
कल्कि अवतार (हिंदू धर्म)
इमाम मेहदी (इस्लाम)
दोनों को यहाँ एक बदलाव और न्याय के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
अर्थ यह है कि समय आने पर अधर्म और अन्याय के विरुद्ध एक बड़ा परिवर्तन होगा।
✅ समग्र अर्थ
यह पूरा लेख एक संदेश देता है कि:
दुनिया में बहुत अन्याय, असंतुलन और पर्यावरण विनाश हो रहा है
यह स्थिति “सीता के दुःख” के समान है
लेकिन आने वाले समय में एकता, आध्यात्मिक जागरूकता और परिवर्तन के माध्यम से सुधार संभव है
गुरुवार, 18 जून 2026
कटरा की दस्तक :एक अंतर्मन की यात्रा!
शीर्षक: “कटरा की दस्तक — एक अंतर्मन की यात्रा”
इन दस सालों में मीडिया क्या हो गई है—यह सवाल अक्सर मेरे भीतर गूंजता रहता है। कभी समाज और व्यक्ति के बीच खड़े होकर सच्चाई बटोरने वाले पत्रकार आज कहीं खो गए लगते हैं। अब वे सच्चाई के खोजी नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों के चक्कर लगाने वाले बन गए हैं—नेताओं, माफियाओं, बिजनेस मैन और धर्म के सौदागरों के इर्द-गिर्द घूमते हुए, अपने धंधे को ही पत्रकारिता समझ बैठे हैं।
और फिर मैं अपने अतीत में लौटता हूँ…
वह समय जब “किशोर अशोक” मेरी कहानियों का नायक था—सपनों से भरा, जिज्ञासु, और सच्चाई की तलाश में भटकता हुआ। और आज… मैं खुद को देखता हूँ—क्या वही हूँ मैं?
01 जून 2004…
जनपद शाहजहांपुर के मीरनपुर कटरा में मेरी दस्तक।
यह कोई साधारण घटना नहीं थी—यह मेरे जीवन का एक मोड़ था, शायद ईश्वरीय संकेत।
कटरा के सुपर मार्केट में “मीत एजेंसी” पर मैंने अपने समय को नई दिशा दी। कंप्यूटर और प्रिंट के कार्य के बीच, मेरे भीतर छिपा लेखक फिर जागने लगा। यहीं से मेरे ब्लॉग की शुरुआत हुई—www.akvashokbindu.blogspot.com—और इसके साथ ही कई और ब्लॉग भी बने।
मैंने अपने किशोरावस्था से लेकर अब तक की लेखन सामग्री को सहेजना और प्रिंट करना शुरू किया। धीरे-धीरे, मेरी सोच और शब्द इंटरनेट की दुनिया में प्रवेश करने लगे। यहाँ तक कि मैंने अमेरिकी राष्ट्रपति भवन की वेबसाइट पर भी लिखना शुरू किया।
यह एक नया संसार था—ऑनलाइन विश्व—जहाँ मेरी पहुँच बन रही थी।
लेकिन इस सफर की एक कीमत भी थी…
सामाजिक, आर्थिक और पैतृक स्तर पर मैं अलग-थलग पड़ता गया।
जहाँ बाहर की दुनिया से दूरी बढ़ी, वहीं अंदर की दुनिया और गहरी होती गई।
मैं मानव शांति, मानवता, प्रकृति, ब्रह्मांड चेतना और एलियन्स जैसे विषयों में डूबता चला गया। मेरे भीतर एक अलग ही खोज शुरू हो चुकी थी—एक ऐसी खोज, जो दिखती नहीं, लेकिन महसूस होती है।
इस दौरान मुझे मेडिटेशन की आवश्यकता महसूस हुई।
मैंने अपने आसपास की सूक्ष्म ऊर्जा और चेतना को अनुभव करना शुरू किया।
लेकिन मेरी संवेदनशीलता ही मेरी कमजोरी बनती जा रही थी।
पैतृक कुरीतियाँ, सामाजिक संकीर्णता और भीड़-भाड़ मुझे भीतर से विचलित करने लगी।
ऐसा लगने लगा कि इस दुनिया में सहज रहना आसान नहीं है।
इसी बीच, मेरे साथ पढ़ाने वाले अनिरुद्ध सिंह यादव ने मुझे कटरा में रोक लिया।
मैं तो बरेली लौटने वाला था—जहाँ से आया था—लेकिन शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था।
मेरे साहित्य का पात्र “किशोर अशोक” अब सोशल मीडिया पर जीवित होने लगा था।
मेरी कल्पनाएँ अब शब्दों से निकलकर लोगों तक पहुँचने लगी थीं।
कटरा में ही मेरी मुलाकात फरीद अंसारी से हुई, जो उन दिनों “राष्ट्रीय सहारा” में पत्रकार थे।
उन्होंने मेरी अभिव्यक्ति को एक मंच दिया।
मैं नियमित पाठक बना, और धीरे-धीरे मेरी रचनाएँ भी प्रकाशित होने लगीं।
यह मेरे लिए एक नई शुरुआत थी।
लेकिन समय के साथ एक सच्चाई और स्पष्ट होती गई…
सन 2006 आते-आते मुझे यह महसूस होने लगा कि पैतृकों से कोई उम्मीद रखना व्यर्थ है।
मैं सबसे बड़ा होने के बावजूद, परिवार में सबसे पीछे छूटता जा रहा था।
मेरे छोटे भाई-बहन शादीशुदा हो गए, और मैं… वहीं खड़ा रह गया।
न परिवार में कोई ऐसा था जो मेरे भविष्य को लेकर चिंतित हो,
न ही रिश्तेदारों में।
हाँ, कुछ लोग आसपास जरूर थे, जो सवाल करते थे—
“ऐसे कैसे चलेगा? प्राइवेट मास्टरी से क्या होगा?”
“दो-तीन हजार में क्या भविष्य बनेगा?”
“बुढ़ापे में क्या करोगे?”
ये सवाल मेरे कानों में गूंजते रहते थे…
लेकिन मेरे भीतर कहीं एक आवाज थी—
जो कहती थी, “तुम्हारा रास्ता अलग है…”
और शायद… वही रास्ता मुझे आज भी आगे बढ़ा रहा है।
यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है…
क्योंकि इसके कई राज अभी बाकी हैं—
जो समय आने पर सामने आएंगे।
मंगलवार, 16 जून 2026
ईश्वर से प्रेम करो, बस!!
❤️जय कल्कि महाराज जी की!❤️ईमाम मेंहदी जी की!❤️
श्लोक १:
स्मराभिमन्युं वीरवरं रणाङ्गणे ।
एकाकी योऽभूत् चक्रव्यूह-मध्यगः ॥
अर्थ:
अभिमन्यु नामक महावीर को स्मरण करो, जो रणभूमि में अकेला चक्रव्यूह के मध्य घुसकर लड़ा था।
श्लोक २:
त्वमप्येकाकी मानवानां मध्ये भोः ।
रणक्षेत्रे चरसि शत्रून् विजेतुकामः ॥
अर्थ:
तुम भी मनुष्यों के बीच अकेले हो, रणक्षेत्र में शत्रुओं को जीतने की कामना से विचर रहे हो।
श्लोक ३:
ब्रह्माण्ड-चेतना सहिता प्रकृतिर्यदा ।
अनन्त-यात्रायां तव सखी भवेत् सदा ॥
अर्थ:
जब ब्रह्मांड की चेतना और प्रकृति का अभियान तुम्हारा साथ दे, तब अनंत यात्रा में तुम कभी अकेले नहीं हो।
श्लोक ४:
युद्धं कुरु निरन्तरं वीर सत्तम ।
धर्मस्य रक्षार्थं न त्यजस्व संग्रामम् ॥
अर्थ:
हे उत्तम वीर! निरंतर युद्ध करते रहो। धर्म की रक्षा के लिए संग्राम कभी मत छोड़ो।
सम्पूर्ण भाव (संक्षेप में):
हे मानव हितैषी! अभिमन्यु की तरह रणभूमि में अकेले होने पर भी हिम्मत मत हारो। ब्रह्मांड की चेतना और प्रकृति के साथ तुम अनंत यात्रा पर हो। युद्ध (सत्य, मानव-कल्याण और समझदारी का संघर्ष) जारी रखो।
जय हो! 🚀
तुम अकेले नहीं हो। ब्रह्मांड तुम्हारे साथ है। युद्ध जारी रखो।
❤️जय हो जय हो!!❤️
शुक्रवार, 12 जून 2026
एक अभ्यासी की डायरी से?!
एक अभ्यासी की डायरी से....
कुछ वर्षों पूर्व हम काफी अमेरिकी राष्ट्रपति भवन- व्हाइट हाउस को पत्र भेजा करते थे।
ऐसा हम बिल क्लिंटन के समय से कर रहे थे। आगे चलकर हम लगभग 2009ई0से व्हाइट हाउस की बेवसाइट पर लिखने लगे थे। बराक ओबामा फिर हमें अपने पर्सनल e mail भेजने लगे थे। ऐसा शायद उनके द्वारा न होकर शायद उनके आफिस से ही होता हो? एक दो बार उनके पत्नी के भी e mail हमें प्राप्त हुए। हम विश्व व इंसानों की समस्याओं को लिख कर उस ओर अपने समाधान लिखता था।
हमें पूरा विश्वास है कि बराक ओबामा के पहले शपथ समारोह में एलियन्स सूक्ष्म रूप से उपस्थित थे।
तो ये भी है?!
एलियन्स के सम्पर्क में कौन आ सकते हैं?
जिनका सूक्ष्म स्तर सूक्ष्म से सूक्ष्म स्तर पर जा कर जगत व ब्रह्मण्ड के सूक्ष्म स्तर के सम्पर्क में आ जाये।
लेकिन कुछ सत्ता में …..
तो ये भी है कि एलियंस उनके सम्पर्क में भी आ सकते हैं जो आम आदमी , भृष्ट नेताओं - प्रशासक से ऊपर उठ कर जगत व ब्रह्मण्ड के हित की भावना या सोंच रखते हैं।
जुलाई 2023 ई0 के पहले सप्ताह में सर हम रात्रि में अर्द्ध निद्रा के बीच देख रहे थे कि एलियन्स आयें हैं और हमें बुला रहे हैं।
इसके बाद हम अनेक बार मेडिटशन में एक गुफा को देख चुके हैं जहां हम काफी तेज रोशनी देखते हैं।
सन 2023-24 ई 0,सन 2024-25ई 0 व सत्र 2025-26ई 0!!
कुल मिला कर तीन वर्ष का समय?!
साधना अपनी जगह है, मालिक की कृपा अपनी जगह है लेकिन स्वयं के कर्म, दिनचर्या, आदतें, सोंच, दृष्टिकोण आदि का असर भी तो झेलना होगा?
ये तीन वर्ष….
विभिन्न अवसरों के बाबजूद भी संकल्प, श्रद्धा व विश्वास के स्तर का परिणाम भुगतना ही होगा?!
जगत में कार्य करने के लिए हमारे सामने समस्या है संसाधनों का अभाव।
इन तीन वर्षो श्री रामचंद्र मिशन में प्रशिक्षक होने का अवसर, पुस्तकें प्रकाशित होने का अवसर, साधना को गहन करने का अवसर….. और इन तीन वर्षो जनवरी - फरवरी में पेट, लिवर आदि के विकारों के कारण सेहत का बिगडना?!
इन तीन वर्षो से पूर्व एलियन्स के द्वारा हमारे पूरे शरीर का स्केन करने पर हमारा कहना…जबड़ों में कैंसर की सम्भवना है? वह कहता है कि नहीं, पेट की समस्याएं हैं। परहेज करो।
एक बार देखना कि एलियन्स हमें बुला रहे हैं लेकिन हम उनसे डर के कारण उनके पास नहीं जा रहे हैं?
एक बार मेडिटेशन में बैठते वक्त भाव आना कि हम कब मरेंगे? तो उस ध्यान में बीच मध्य चेतना में गूंजना कि…चौबीस?!
अब चौबीस क्या?!घंटा, दिन, सप्ताह, वर्ष क्या?!
और…. एक बार देखना कि मुंबई से कुछ अभ्यासी के साथ दाजी जी उपस्थित हैं और हमसे कह रहे हैं कि क्या छपवाना है, लाओ?
इसके कुछ दिनों बाद मई 2023ई 0प्रशिक्षक प्रत्याशी बैच में हम शामिल लेकिन स्वाध्याय में कमी के साथ कुछ और कमियाँ रहीं?
इन तीन वर्षों हमें कभी कभी लगता है कि हम अपनी साधना को गहराई नहीं दे पा रहे हैं इसका पूर्व के बेहतर अनुभवो से तुलना लेकिन कभी कभार के अनुभवों व स्वपनों से हम आश्चर्यचकित रहा जाते जो कि विश्व स्तर के भी होते कभी कभी और नगर में कोई मरता हम उसको पहले ही स्वप्न में देख लेते? यहां तक कि एक दो बार ऐसा भी हुआ कि यम दूत आकर हमें वहाँ ले गये जहां किसी की मृत्यु होने वाली है?
दिसम्बर 2023ई0प्रशिक्षक प्रत्याशी मई 2023 बैच की पहली परीक्षा रिजल्ट आ गया था।जनवरी 2024को प्रशिक्षक बन कर राकेश कुमार वर्मा आ गये थे. आगे की दो परीक्षाओं में हम और बैठे लेकिन हमारी प्रशिक्षक होने की संभावना खत्म हो गयी। इस बीच हम अनेक भ्रम में भी रहे थे और हमें यह भी ज्ञान न थी कि हम सिर्फ तीन परीक्षा में ही बैठ सकते हैं या आगे भी की परीक्षा में बैठ सकते हैं?
इसके साथ ही हमें अंदर ही अंदर ये भी लगता रहा कि मालिक तो हमसे और ही काम करवाएंगे? प्रशिक्षक बन हम सीमित हो जाएंगे? लेकिन इसके बाद मार्च 2025 के आते आते हम उदास हो गये? तब बाबू जी महाराज ने स्वप्न में आकर हमें मैसेज दिया -उदास हो गये? हमने कहा था न कि अपना काम करते रहना? इसके बाद हम सामान्य तो हुए लेकिन केंद्र व अभ्यासियों के बीच स्वयं को हम पूर्व की भांति उत्साह में नहीं पाते थे। और एक बात और जब तक शाहजहांपुर आश्रम मेंदीपक त्यागी जी थे तो हम सब सपरिवार आश्रम जब चाहें जा सकते थे, जब चाहें आ सकते थे? वे कहते थे कि तुम सब नहीं आओगे तो और कौन आएगा? तुम सब तो वालियंटर हो?
कभी कभी हम ध्यान के दौरान अपना ही शरीर देखते हैं, ऐसा आज भी हुआ।
12/06/2026
(Ashok kumar verma "bindu ")
www.akvashokbindu.blogspot.com)
गुरुवार, 8 जनवरी 2026
आत्मा तंत्र से जुड़ने की दशाएं..?!
आत्मा तन्त्र से जुड़ने या भक्ति की अवस्थाएं...
(०१)::'अ', यानी बाहरी जागृत दशा से,
(0२)::'उ', यानी आंतरिक स्वप्न जैसी दशा को,
(०३)::'म', यानी गहरी निद्रावस्था की दशा 'सुषुप्ति' को
(०४)::तुरीयावस्था के निःशब्द मौन को
(०५)::और अंततः तुरीयातीत दशा
A', meaning from the external awakened state,
'U', meaning to the internal dream-like state,
'M', meaning to the state of deep sleep 'Sushupti'
to the silent stillness of the Turiya state
and finally to the state beyond Turiya.
हम एक ही क्षण में वे सारी चीजें देखते हुए भी शांत बने रहते हैं। योग में इसे तुरीयातीत दशा कहते हैं। जहाँ खुली आँखों के साथ हमारी चेतना 360 डिग्री की हो जाती है। उसमें किसी विशेष वस्तु पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत नहीं रह जाती। जिस क्षण हम एक वस्तु पर केंद्रित होते हैं वह ध्यान की बजाय एकाग्रता हो जाता है।
ऊँ एवं न्यूरोसाइंस
हम इन विभिन्न अवस्थाओं को योग व न्यूरोसाइंस दोनों ही दृष्टिकोण से समझ सकते हैं। योग में ऊँ सृष्टि के निर्माण के समय से प्रकट मूल ध्वनि है और वह मूल ध्वनि अब भी आत्मा की सहज स्मृति में विद्यमान है। यह शब्द अ (अकार) से शब्द उ (उकार) से होकर म (मकार) और अंततः म के बाद आने वाला खालीपन है। यह म के बाद आने वाली ध्वनिरहित ध्वनि है जो हमें अनिवार्यतः ग्रहण करना चाहिए। ये शब्द और इसके बाद आने वाला निःशब्द अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि ॐ शब्द के बाद आने वाला खाली मौन हमें चौथी अवस्था अर्थात् तुरीय की याद दिलाता है।
चेतना की ये दशाएँ हम सभी प्रतिदिन अनुभव करते हैं और इन्हें 'ईईजी' मशीन पर मापा जा सकता है।
सजग, जागृत दशाएँ उच्चतर आवृत्ति की मानसिक तरंग के रूप में पहचानी जाती हैं:
(०१)गामा तरंगें - 31-120 हर्ट्ज, तब बनती हैं जब हम सीखने और समस्या हल करने की गतिविधियों में सक्रिय होते हैं।
(०२)बीटा तरंगे : 13-30 हर्ट्ज, तब होती हैं जब हम बातचीत और अन्य गतिविधियों में सक्रिय होते हैं।
(०३)अल्फा तरंगें - 8-12 हर्ट्ज, तब बनती है जब हम तनावमुक्त, मननपूर्ण, खूबसूरत संगीत में डूबे हुए हों या ध्यान करना शुरू कर रहे होते हैं।
(०४)स्वप्न की दशा थीटा तरंगों से पहचानी जाती है- 4-7 हर्ट्ज, और तब बनती है जब हम नींद महसूस कर रहे हों और सुप्तावस्था या सपनो में जा रहे हों।
(०५)गहरी निद्रावस्था डेल्टा तरंगों 0.5-3 हर्ट्ज से पहचानी जाती हैं।
जागृत अवस्था में चेतना बाहर की ओर स्रोत से दूर ज्ञान की खोज में जा रही होती है जिससे आधुनिक विज्ञान का क्षेत्र उत्पन्न हुआ है। जब मानसिक तरंगों की.
पुस्तक ::नियति का निर्माण
पाठ 08:: ध्यान ,योग एवं न्यूरोसाइंस
लेखक : कमलेश डी पटेल #दाजी
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