गुरुवार, 18 जून 2026

कटरा की दस्तक :एक अंतर्मन की यात्रा!

शीर्षक: “कटरा की दस्तक — एक अंतर्मन की यात्रा” इन दस सालों में मीडिया क्या हो गई है—यह सवाल अक्सर मेरे भीतर गूंजता रहता है। कभी समाज और व्यक्ति के बीच खड़े होकर सच्चाई बटोरने वाले पत्रकार आज कहीं खो गए लगते हैं। अब वे सच्चाई के खोजी नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों के चक्कर लगाने वाले बन गए हैं—नेताओं, माफियाओं, बिजनेस मैन और धर्म के सौदागरों के इर्द-गिर्द घूमते हुए, अपने धंधे को ही पत्रकारिता समझ बैठे हैं। और फिर मैं अपने अतीत में लौटता हूँ…
वह समय जब “किशोर अशोक” मेरी कहानियों का नायक था—सपनों से भरा, जिज्ञासु, और सच्चाई की तलाश में भटकता हुआ। और आज… मैं खुद को देखता हूँ—क्या वही हूँ मैं? 01 जून 2004… जनपद शाहजहांपुर के मीरनपुर कटरा में मेरी दस्तक। यह कोई साधारण घटना नहीं थी—यह मेरे जीवन का एक मोड़ था, शायद ईश्वरीय संकेत। कटरा के सुपर मार्केट में “मीत एजेंसी” पर मैंने अपने समय को नई दिशा दी। कंप्यूटर और प्रिंट के कार्य के बीच, मेरे भीतर छिपा लेखक फिर जागने लगा। यहीं से मेरे ब्लॉग की शुरुआत हुई—www.akvashokbindu.blogspot.com—और इसके साथ ही कई और ब्लॉग भी बने। मैंने अपने किशोरावस्था से लेकर अब तक की लेखन सामग्री को सहेजना और प्रिंट करना शुरू किया। धीरे-धीरे, मेरी सोच और शब्द इंटरनेट की दुनिया में प्रवेश करने लगे। यहाँ तक कि मैंने अमेरिकी राष्ट्रपति भवन की वेबसाइट पर भी लिखना शुरू किया। यह एक नया संसार था—ऑनलाइन विश्व—जहाँ मेरी पहुँच बन रही थी। लेकिन इस सफर की एक कीमत भी थी… सामाजिक, आर्थिक और पैतृक स्तर पर मैं अलग-थलग पड़ता गया। जहाँ बाहर की दुनिया से दूरी बढ़ी, वहीं अंदर की दुनिया और गहरी होती गई। मैं मानव शांति, मानवता, प्रकृति, ब्रह्मांड चेतना और एलियन्स जैसे विषयों में डूबता चला गया। मेरे भीतर एक अलग ही खोज शुरू हो चुकी थी—एक ऐसी खोज, जो दिखती नहीं, लेकिन महसूस होती है। इस दौरान मुझे मेडिटेशन की आवश्यकता महसूस हुई। मैंने अपने आसपास की सूक्ष्म ऊर्जा और चेतना को अनुभव करना शुरू किया। लेकिन मेरी संवेदनशीलता ही मेरी कमजोरी बनती जा रही थी। पैतृक कुरीतियाँ, सामाजिक संकीर्णता और भीड़-भाड़ मुझे भीतर से विचलित करने लगी। ऐसा लगने लगा कि इस दुनिया में सहज रहना आसान नहीं है। इसी बीच, मेरे साथ पढ़ाने वाले अनिरुद्ध सिंह यादव ने मुझे कटरा में रोक लिया। मैं तो बरेली लौटने वाला था—जहाँ से आया था—लेकिन शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था। मेरे साहित्य का पात्र “किशोर अशोक” अब सोशल मीडिया पर जीवित होने लगा था। मेरी कल्पनाएँ अब शब्दों से निकलकर लोगों तक पहुँचने लगी थीं। कटरा में ही मेरी मुलाकात फरीद अंसारी से हुई, जो उन दिनों “राष्ट्रीय सहारा” में पत्रकार थे। उन्होंने मेरी अभिव्यक्ति को एक मंच दिया। मैं नियमित पाठक बना, और धीरे-धीरे मेरी रचनाएँ भी प्रकाशित होने लगीं। यह मेरे लिए एक नई शुरुआत थी। लेकिन समय के साथ एक सच्चाई और स्पष्ट होती गई… सन 2006 आते-आते मुझे यह महसूस होने लगा कि पैतृकों से कोई उम्मीद रखना व्यर्थ है। मैं सबसे बड़ा होने के बावजूद, परिवार में सबसे पीछे छूटता जा रहा था। मेरे छोटे भाई-बहन शादीशुदा हो गए, और मैं… वहीं खड़ा रह गया। न परिवार में कोई ऐसा था जो मेरे भविष्य को लेकर चिंतित हो, न ही रिश्तेदारों में। हाँ, कुछ लोग आसपास जरूर थे, जो सवाल करते थे— “ऐसे कैसे चलेगा? प्राइवेट मास्टरी से क्या होगा?” “दो-तीन हजार में क्या भविष्य बनेगा?” “बुढ़ापे में क्या करोगे?” ये सवाल मेरे कानों में गूंजते रहते थे… लेकिन मेरे भीतर कहीं एक आवाज थी— जो कहती थी, “तुम्हारा रास्ता अलग है…” और शायद… वही रास्ता मुझे आज भी आगे बढ़ा रहा है। यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है… क्योंकि इसके कई राज अभी बाकी हैं— जो समय आने पर सामने आएंगे।

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