चलो ठीक, सामने वाला अपराधी ही हम मान लेते हैं।
शनिवार, 3 अप्रैल 2021
अंगुलिमाल की गलियों में अहिंसा का अस्त्र::अशोकबिन्दु
चलो ठीक, सामने वाला अपराधी ही हम मान लेते हैं।
प्राणाहुति परंपरा और ऊर्जा शरीर ऊर्जा,चेतना कुम्भ ,ज्योतिर्लिगों के पीछे का रहस्य::अशोकबिन्दु
अपनी व जगत के प्रकृति की पूर्णता की समझ और एहसास ही वास्तव में ज्ञान है जो ही वास्तव में सनातन की और ले जाता है।
गुरुवार, 1 अप्रैल 2021
वेदांगों में ज्योतिष पर हम केंद्रित होते रहे हैं::अशोकबिन्दु
शिक्षा,कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरूक्त वेदांग हैं। हम आज की तारीख तक ज्योतिष को छठ वां अंग ही मानते हैं।ज्योति+ईष अर्थात ज्योति का संकेत। वेद हमारे लिए पुस्तक नहीं वरन दशा है।
- शिक्षा - इसमें वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है। स्वर एवं वर्ण आदि के उच्चारण-प्रकार की जहाँ शिक्षा दी जाती हो, उसे शिक्षा कहाजाता है। इसका मुख्य उद्येश्य वेदमन्त्रों के अविकल यथास्थिति विशुद्ध उच्चारण किये जाने का है। शिक्षा का उद्भव और विकास वैदिक मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण और उनके द्वारा उनकी रक्षा के उदेश्य से हुआ है।
- कल्प - वेदों के किस मन्त्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिये, इसका कथन किया गया है। इसकी तीन शाखायें हैं- श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र। कल्प वेद-प्रतिपादित कर्मों का भलीभाँति विचार प्रस्तुत करने वाला शास्त्र है। इसमें यज्ञ सम्बन्धी नियम दिये गये हैं।
- व्याकरण - इससे प्रकृति और प्रत्यय आदि के योग से शब्दों की सिद्धि और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध होता है। वेद-शास्त्रों का प्रयोजन जानने तथा शब्दों का यथार्थ ज्ञान हो सके अतः इसका अध्ययन आवश्यक होता है। इस सम्बन्ध में पाणिनीय व्याकरण ही वेदांग का प्रतिनिधित्व करता है। व्याकरण वेदों का मुख भी कहा जाता है।
- निरुक्त - वेदों में जिन शब्दों का प्रयोग जिन-जिन अर्थों में किया गया है, उनके उन-उन अर्थों का निश्चयात्मक रूप से उल्लेख निरूक्त में किया गया है। इसे वेद पुरुष का कान कहा गया है। निःशेषरूप से जो कथित हो, वह निरुक्त है। इसे वेद की आत्मा भी कहा गया है।
- ज्योतिष - इससे वैदिक यज्ञों और अनुष्ठानों का समय ज्ञात होता है। यहाँ ज्योतिष से मतलब `वेदांग ज्योतिष´ से है। यह वेद पूरुष का नेत्र माना जाता है। वेद यज्ञकर्म में प्रवृत होते हैं और यज्ञ काल के आश्रित होते है तथा जयोतिष शास्त्र से काल का ज्ञान होता है। अनेक वेदिक पहेलियों का भी ज्ञान बिना ज्योतिष के नहीं हो सकता।
- छन्द - वेदों में प्रयुक्त गायत्री, उष्णिक आदि छन्दों की रचना का ज्ञान छन्दशास्त्र से होता है। इसे वेद पुरुष का पैर कहा गया है। ये छन्द वेदों के आवरण है। छन्द नियताक्षर वाले होते हैं। इसका उदेश्य वैदिक मन्त्रों के समुचित पाठ की सुरक्षा भी है।
शनिवार, 20 मार्च 2021
हमारे अंतर व्यक्ति की झलक है हमारा जगत::अशोकबिन्दु
हम अंदर से सन्तुलित होते है तो बाहर भी सन्तुलित होते हैं।हम अंदर से अनुशासित होते हैं तो बाहर से भी अनुशासित होते हैं।
यम में न होना नास्तिकता:: अशोकबिन्दु
अहिंसा को कौन समझ सकता है!?
हमारा अनुभव तो यही कहता है कि 90 प्रतिशत नरक योनि की संभावनाओं व भूत योनि की संभावनाओं में जीते हैं।व्यक्ति के साथ हर स्तर पर हर बिंदु पर दो सम्भावनाएं छिपी होती हैं। सभी हार्ड वेयर में पारंगत होना चाहते हैं लेकिन साफ्टवेयर पर कोई नया कुछ करने की क्षमता नहीं रखता। अब विज्ञान भी कहने लगा है कि प्राणियों व जगत की प्रकृति में परिवर्तन के कारण,अवस्थाएं के पीछे कारण भौतिक ही नहीं हैं, हार्डवेयर ही नहीं हैं सूक्ष्म व कारण भी हैं, साफ्टवेयर भी हैं।
यदि किसी क्षेत्र आदि के प्रकृति, नदियों, पहाड़ आदि को प्रभावित किया जाता, नष्ट किया जाता है तो इसका कारण प्रभावित करने वाले,नष्ट करने वाले का सूक्ष्म ,नजरिया, विश्वास आदि होता है।जिसमें हम भूल जाते हैं कि जिसे हम नष्ट कर रहे रहे हैं प्रभावित कर रहे हैं उसका भी सूक्ष्म व कारण है। जगत में जो कुछ भी है वह एक व्यवस्था के तहत है जिसे एक ऋषि एक नबी ही महसूस कर सकता है, आचार्य ही महसूस कर सकता है। अपनी व जगत की सम्पूर्णता के अहसास / ज्ञान में जीने के लिए योग के प्रथम अंग- यम से गुजरना आवश्यक है। जिसे ऋषभ देव, जड़ भारत ने अपने आचरण में स्वीकार किया-सत्य, अहिंसा,अस्तेय अपरिग्रह व ब्रह्मचर्य । जिसे जिन(जैन) ने महाव्रत कहा।जिन या जैन का मतलब है-विजेता।आदि योगी कौन था? सद्गुरु कहते हैं- जो आदि योगी सप्त ऋषियों के द्वारा कहलाया वह अनाम था, उसके माता पिता से हर कोई अंजान था।वह सिर्फ मौन में रहा। यम में होना हमारा विश्वास है,यम में न होना अविश्वास है,नास्तिकता है। हमारे व जगत के अंदर जो है स्वतः व निरन्तर है उस ओर किसकी निगाह है। उसकी व्यवस्था पर निगाह किसकी है? ऐसे में अहिंसा की क्या भूमिका है? हिंसा भी उस पर क्या अविश्वास नहीं है जो स्वतः व निरन्तर है?
ऐसे में मौन रह कर कर्म या कर्तव्य का क्या महत्व है?9
हम देखते हैं विभिन्न संस्थाओं में क्या हो रहा है?
शुक्रवार, 19 मार्च 2021
चित्रकूट से वो सन्देश::सत्र 2004-5ई0:::अशोकबिन्दु
जुलाई2004ई0 हमारे इस जीवन पड़ाव में बदलाव का नया अवसर था इस वक्त से लगभग डेढ़ साल ये डेढ़ साल हमारे द्वंद भरे थे।
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021
कर्म-यज्ञ... प्रकृति अभियान... अनन्त यात्रा की जिम्मेदारी में आहुतियां:::अशोकबिन्दु
तमाम ग्रंथों का उद्देश्य है आत्म प्रबंधन एवं समाज प्रबंधन ।
इस हेतु शिक्षा भी है । हम शिक्षा को क्रांति मानते रहे हैं। लेकिन आजकल के शिक्षकों ,शिक्षित, विद्यार्थियों को देखकर हम कहना चाहेंगे कि आजकल शिक्षा सबसे बड़ा भ्रष्टाचार बन चुका है ।
गीता के एक भाष्यकार ने लिखा है- कर्म क्या है?कर्म है -यज्ञ।
यज्ञ है प्रकृति अभियान, जो कि स्वतः है निरन्तर है।अनन्त यात्रा की जिम्मेदारी है।उसी में जीना, आहुति जीवन है।जीवन जीना है।हमारा जीवन व तथाकथित कर्म तो चेष्टाएं मात्र हैं-हमारे इंद्रियों के प्रभाव का। हमारे व जगत के अंदर स्वतः निरन्तर है ,वही सनातन है।वही यज्ञ है। यज्ञ जो अग्नि कुंड तक सीमित है वह तो मात्र प्रतीक है, बनाबटी है। पारसी संस्कृति में कुंड की अग्नि जिसके चारों ओर बैठ कर विधाता की याद में आचरण किए जाते हैं, वह अग्नि #इहराम है। हजयात्रा के दौरान यह #इहराम भौतिक रूप बदल लेता है लेकिन सूक्ष्म जगत में वह सर्वव्याप्त है।रमा है सर्वत्र..!!








