गुरुवार, 10 जून 2021

संयुक्त राष्ट्र संघ के 75 वर्ष::अशोकबिन्दु

 संयुक्त राष्ट्र संघ के 75 वर्ष!! ---------------------------------------




 चारों ओर जिधर भी निगाह पड़ती है सब प्रकृति है इस प्रकृति में अदृश्य भी है गुप्त भी है कंप्यूटर की तरह हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर हम जीवन रूपी कार्यक्रम या व्यवस्था की पूर्णता संपूर्णता या आल(all) से तब जुड़ सकते हैं जब उसके हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर पर संतुलित रूप से कार्य करेंगे प्रयोग करेंगे उसे अपने अनुभव में चिंतन मनन में उसे शामिल करेंगे संतुलन ही स्वास्थ्य है शांत की ओर जाने का पद है असंतुलन ही अस्वस्थ है अशांत की ओर जाने का पथ है श्री अर्धनारीश्वर अवधारणा से हमने काफी कुछ सीखा है बाम और दक्षिण में संतुलन को जाना है प्रकृति और ब्राह्मण के संतुलन को जाना है रण आत्मक था और धना तक धनात्मक ता के संतुलन को जाना है उपवन को गुलाब के महक से भरने के लिए गुलाब के पौधे में गुलाब पुष्प को ही नहीं संपूर्णता का ख्याल आवश्यक है। अनुशासन और शांति अंदर से आती है बाहर से नहीं हमारे और जगत के अंदर जो है कुछ तो है जो सोता है निरंतर है सर्वत्र है अनंत यात्रा में साक्षी है वही शांति और अनुशासन भी है वह के लिए वातावरण प्रश्न जागरण साहस त्याग आदि आवश्यक है। ब्रह्मांड में मनुष्य के अलावा सब नियमित है वह सहेज है मनुष्य आज अपनी कक्षा से बाहर हो चुका है सृष्टि के समय वह जिस सहजता में था उससे दूर जा चुका है जिसे हम असभ्य मानते हैं उन वनवासियों का जब अध्ययन किया गया तो वे प्रकृति के समीप अवश्य इस तंत्र में देखे गए उनको नुकसान हमारे विकास नहीं पहुंचाया है हमारे बुद्धि आधारित विकास ने विश्व बा और प्रकृति को क्या दिया है ब्राह्मण विश्व और प्रकृति के हम एक कड़ी हैं जैसे जंजीर में एक कड़ी बुद्धि कड़ियां देखती है विविधता और भिन्नता देखती है भेद देखती है। वह यह नहीं देखती कि हम सब में और जगत में कुछ है जो सोता है और निरंतर है हम अपने को महसूस नहीं करते कर रहे हैं जब हम अपने को ही महसूस नहीं कर रहे हैं तो जगत में अनियंत्रित चेतना तरंगों आत्माओं को क्या देखें ए आत्मीयता संवेदना क्या है यही तो हमारी नेता है चेतना का प्रभाव है जीव जंतु प्रकृति और हम परस्पर एक दूसरे की चेतना को अनुभव में एहसास में ही सकते हैं जो ही जीवन है जो ही प्रेम है जो के लिए विज्ञान अति अभी गुरुत्वाकर्षण तक या ऊर्जा या आभामंडल तक पहुंची है शिक्षा सुधार परिवर्तन विकास हिलता अपनी इसी अंतर चेतना को अग्रिम बिन्दु तक ले जाना निरंतर अभ्यास और अभ्यास हेतु वातावरण इस अभ्यास और अभ्यास हेतु वातावरण के लिए स्वयं व्यक्ति कुल मोहल्ला या वार्ड गांव और नगर जनपद प्रांत राष्ट्र और विश्व स्तर पर अनुशासन व्यवस्था प्रशासन आवाज की आवश्यकता रहती है अब हमें परिवर्तन को स्वीकार करने की जरूरत है हर मिनट पर परिवर्तन को स्वीकार करने की जरूरत है। सन 1945 से विश्व ने अपने को बदलते देखा है द्वितीय विश्व युद्ध ने मानवता का गला घोटा है अनेक देशों ने स्वतंत्रता की सास सिर्फ राजनीतिक स्तर पर ही ली है शक्तावत पूंजीवाद पुरोहित बाद और जातिवाद में नए ढंग से अपना स्वरूप सजाया है इस सबके बीच मानवता और उसकी चेतना को अग्रिम बिंदुओं और स्तरों पर ले जाने प्रश्न करने नए सिरे से प्रारंभ हो जाने चाहिए प्रारंभ होगी गए हैं प्रणाहूति व्यवस्था जो राजा दशरथ बार आया जनक के बाद लुप्त सी हो गई थी उसे सूफी संत हजरत की ब्लॉक मौलवी फजल अहमद खान साहब रायपुरी ने श्री रामचंद्र जी महाराज फतेहगढ़ को सौंपी जिसकी सूरत में सन 1945 में उत्तर प्रदेश के ही शाहजहांपुर में बाबू जी महाराज के द्वारा श्री रामचंद्र मिशन की स्थापना की गई विश्व शांति और विश्व कल्याण के लिए संयुक्त राष्ट्र की भी रूपए का खड़ी हुई है 24 अक्टूबर 1920 ईस्वी को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के 75 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं इन वर्षों में विश्व शांति और मानवता के अनेक प्रश्न हुए हैं इसके बावजूद आर्थिक पूर्ण विश्वास शीत युद्ध कट्टरता अलगाववाद आतंकवाद सांप्रदायिकता आज को विश्व खेलता रहा है संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को अमेरिका के प्रसिद्ध नगर सैन फ्रांसिस्को में की गई थी यहां पर हम संयुक्त राष्ट्र संघ की विशिष्ट संस्था यूनेस्को अर्थात संयुक्त राष्ट्रीय शैक्षणिक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन के दो महत्वपूर्ण कार्यों का उल्लेख करना चाहेंगे नंबर एक नए अनुसंधान और द्वारा विभिन्न देशों की जनता का जीवन स्तर ऊंचा उठाना नंबर दो विभिन्न देशों के बीच संपर्क और संबंधों की स्थापना करना इस संगठन का कार्यालय पेरिस फ्रांस में है उन्हें स्कोर ने विश्व के सभी देशों में मूल्य आधारित शिक्षा की वकालत की है। हम चाहते हैं संयुक्त राष्ट्र संघ का विस्तार हो भारत इसका स्थाई सदस्य बने विभिन्न देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के संरक्षण और आम जनता को विभिन्न देशों की जनता से परस्पर संबंधों की स्वतंत्रता आज पर विचार करने की आवश्यकता है भाभी भी सरकार के लिए भी तैयारियां आवश्यक हैं कट्टरवाद जातिवाद सांप्रदायिकता आतंकवाद हादसे निष्पक्षता से निपटने की जरूरत है इसके लिए मनुष्य का स्तर उच्च बनाने का वातावरण तैयार करने की भी आवश्यकता है प्रत्येक मनुष्य को विश्व बंधुत्व मानवता आज से जोड़ने के कार्यक्रमों की आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ को सभी देशों की सरकारों से वार्ता करके एक भी सुना रुता एक विश्व सरकार की भावी योजना पर शिक्षा के पाठ्यक्रमों को शामिल करने के साथ-साथ विश्व के देशों के शासकों प्रशासकों कर्मचारियों मानता प्राप्त संस्थाओं में सदस्यों और कर्मचारियों की नियुक्तियों हेतु शिक्षिका ने वार्ता में विश्व बंधुत्व विश्व भाईचारा मानव कल्याण आज को अनिवार्य करने की आवश्यकता है कक्षा 3 और 4 से ही शैक्षिक पाठ्यक्रम में मानवता का रोड़ा अहिंसा विश्व बंधुत्व वसुदेव कुटुंबकम सुपर बंधन अनुशासन प्रकृति संरक्षण आज पर कक्षाओं के आधार पर विषय सामग्री तैयार करने की आवश्यकता है

भारत, अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र संघ एवं विश्व शांति की भावी सम्भावनाएं!:::अशोकबिन्दु

 भारत, अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र संघ एवं विश्व शांति की भावी सम्भावनाएं! ---------------------------------------


------------------------------------ सन2020ई0में संयुक्त राष्ट्र संघ अपने स्थापना की 75 वीं वर्षगांठ माना रहा था। संयुक्त राष्ट्र संघ का उद्देश्य है युद्ध और हिंसा रहित विश्व की स्थापना और विश्व शांति हम श्री रामचंद्र मिशन की भी 85 वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं हजरत की ब्लॉक मौलवी फजल अहमद खान साहब रायपुरी के शिष्य श्री रामचंद्र जी महाराज फतेहगढ़ की याद में स्थापित श्री रामचंद्र मिशन का उद्देश्य विश्व बंधुत्व के साथ-साथ योग का प्रचार प्रसार है अनुसंधान है वैश्विक चुनौतियों पर हम ध्यान नहीं चाहते हैं हम संत गुरु नानक की याद करते हुए बड़ी लकीर पेश कर देना चाहते हैं जिसे जिस लकीर को हमें छोटा करना है उस लकीर के सामने बड़ी लकीर खींच देना है।हमें महानताओं को चुनना है। हमें अपने कर्तव्यों को ले आगे बढ़ते रहना है इसके लिए जो बाधाएं हैं चुनौतियां हैं उन्हें नजरअंदाज करना है भारत का शासन जनकल्याण करते-करते विश्व कल्याण की ओर बढ़ना है। ehsan qazi, institute of peace! हमें प्रकृति अभियान को समझना होगा हमें जातीय मजे भी खुराफात ओं से निकलना होगा हमारा शरीर और यह दुनिया और खुदा ना हिंदू है ना मुसलमान यह हम क्यों नहीं समझते आज विश्व के सामने समस्याएं हैं आज समाज अनेक समस्याओं से ग्रस्त है इसका कारण है इंसान सिर्फ इंसान । जब तक वह अपनी नजरिया को बदलने की कोशिश नहीं करेगा समाज में शांति सूत्र बंधन अहिंसा का वातावरण नहीं बनेगा जब इंसान अनेक जातियों में बंट कर अन्य इंसानों के साथ पेश होता रहेगा।समाज में अमनचैन नहीं आ सकता। विश्व शांति की भावी संभावनाएं दिल खुलने के साथ ही संभव है ।हृदय क्षेत्र में दिव्य प्रकाश का फैलाव ही तो।अशान्ति, हिंसा मुक्त वातावरण कब खड़ा हो सकता है?हृदय क्षेत्र में दिव्य प्रकाश के अनुभव के साथ साथ रात्रि नौ बजे की साधना हमें विश्वबन्धुत्व, विश्व शांति, विश्व सरकार आदि के भाव से भरती है। पहले राष्ट्रसंघ फिर उसकी असफलता के बाद सन 1945 ई0 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना का उद्देश्य था-विश्व को युद्ध के होड़ से बचना।स्पष्ट रूप से ईमानदारी से समीक्षा करने का अवसर किसके पास है? हम ये नहीं कहते हैं कि कोई अपने परिजनों के बीच अपने जातिगत अंतर्गत कर्मकांड रीति-रिवाज आज को छोड़ दें लेकिन यह किसी की व्यक्तिगत घरेलू व्यवस्था हो सकती है लेकिन की बाध्यता जबरदस्ती बंधक मजदूरी आदि के रूप में व घर से बाहर सड़क एवं सार्वजनिक स्थलों पर नहीं मानवता अध्यात्म संविधान हमारी सामाजिकता सार्वजनिक कार्य क्षेत्र आदमी हमारा आचरण और व्यवहार होना आवश्यक है इस हेतु ही संयुक्त राष्ट्र संघ की सब को सक्रिय होना आवश्यक है सन 1947 में भारत को अपना संविधान और शासन हित अवसर मिला 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ। अहिंसा ही परम धर्म है ऐसा भारतीय दर्शन में कहा गया है दया सेवा पर उपकार ,नम्रता, मानवता, ज्ञान आदि हमारा व्यवहारिक धर्म है।आचरणात्मक धर्म है।सनातन हमारा सार्वभौमिक व अन्तर्यामी धर्म है।संघवाद व पंथवाद को अपने में समेटने की इसमें कला है।'अनेकता में एकता'- इसकी प्रमुख विशेषता है। संविधान द्वारा सरकार के विभिन्न भागों के कर्तव्य और अधिकार निश्चित किए जाते है।यह शासकों व शासितों के पारस्परिक सम्बन्धों को सुनिश्चित करता है।भारत में जिसके लिए भारतीय संविधान सभा की मांग एक प्रकार से ' राष्ट्र की स्वाधीनता' की मांग थी।संविधान सभा के सिद्धांत का दर्शन सर्वप्रथम सन 1895 के स्वराज विधेयक में होता है। एक बेहद बाल गंगाधर तिलक के निर्देशन में तैयार हुआ था सन 1924 ईस्वी में पंडित मोतीलाल नेहरू ने ब्रिटिश सरकार के सम्मुख संविधान सभा के गठन की मांग प्रस्तुत की थी सन 1936 ईस्वी तक सन 1938 के कांग्रेस अधिवेशन में संविधान सभा के गठन की मांग को दोहराया गया था अंत में सन 1946 की कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत भारतीय संविधान सभा के प्रस्ताव को स्वीकार कर इसे व्यावहारिक रूप प्रदान किया गया अब हम आगे इतिहास पर नहीं जाना चाहेंगे इस वक्त हम भारतीय संविधान की प्रस्तावना के मूल पाठ पर चिंतन कर रहे हैं। हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को: समाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26नवम्बर 1949 ई0( मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, सम्वत दो हजार छह विक्रमी)को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। @ @ @ @ @ @ अरविंद घोष ने कहा था-'आत्मा ही स्वतंत्रता है। इसपर पहुंचे बिना हम अपूर्ण हैं। आत्मा अपने में अनंत प्रवृत्तियों का द्वार छुपाए हुए हैं स्वामी विवेकानंद के अनुसार अंतर शक्तियों का विकास उसको अवसर सभी देशवासियों को ही नहीं वरन विश्व के सभी मनुष्यों को मिलना चाहिए मनुष्य स्वयं अपना भाग विधाता है उसे वह बताना मिलना ही चाहिए जिससे वह अपना आत्मसम्मान आत्मविश्वास ,स्वाभिमान आत्म गुण आदि जगा सके।श्री मद्भागवत गीता का स्वधर्म है-अंतरस्थित दिव्यता को सम्मान व जगाना।शांति हमारे अंदर स्थित है।बाहर नहीं।जहां अहिंसा ही अहिंसा है अर्थात किसी से कोई भेद न करना।वहां तो अनन्त यात्रा व प्रेम की शाश्वतता है।'सागर में कुम्भ कुम्भ में सागर'- की दशा है।वहां हिंसा अर्थात भेद,द्वेष, घृणा आदि को कोई स्थान नहीं है। विश्व व जगत में शांति का मतलब जानते हो? शांति तो मनुष्य को अपने अंदर तलाश में होगी इस धरती से यदि मनुष्य को उठाकर अंतरिक्ष की किसी अन्य धरती पर धकेलना संभव हो यदि तो इस पर सभी समस्याएं खत्म समस्या विश्व में नहीं है मनु मनुष्य और उसके समाज में है जिस दिन मनुष्य अपने को पहचान जाएगा उस दिन वह समझेगा हमारे जीवन में तो कोई समस्या ही नहीं । हमारी मनुष्यता, आध्यात्मिकता, हृदयता में सभी समस्याओं, अशांति, दुखों का हल है। हजरत क़िब्ला मौलबी फ़ज़्ल अहमद खां साहब रायपुरी के शिष्य श्रीरामचन्द्र महाराज फतेहगढ़ वाले की याद में श्रीरामचन्द्र मिशन की स्थापना करने वाले शाहजहांपुर के बाबुजी महाराज कहा करते थे-" चिंताएं व तकलीफें तभी उत्तपन्न होती हैं जब हमारी मर्जी और ईश्वर की मर्जी में द्वंद होता है।द्वंद होना इसबात का प्रमाण है कि सच्ची भक्ति की कमी है।" विनोवा भावे की पुस्तक ' टाक्स आन गीता'में कहा गया है-"यदि जमीन पथरीली एवं ऊबड़ खाबड़ होगी तो जीवन की नैया को खींचना अत्यंत कठिन होगा।पानी की तरह ही भक्ति तत्व हमारे जीवन की यात्रा को सुलभ बना देता है।" हमारा रुझान,नजरिया,ऋद्धा, संकल्प, कर्म, प्रयत्न(अभ्यास या शिष्य) पन्थ आदि हमें शांति में ले जाता है। मीरा बाई की भक्ति लोकमर्यादा व कुलमर्यादा को भी भूल जाती है। ईसा मसीह की शांति उन्हें 'सूली की कीलों की चुभन' का अहसास नहीं करती। जरूरत है हर व्यक्ति के बुद्धत्व को जगाने की अंगुली वालों की गलियों में समाज और धर्म के ठेकेदार दबंग सेनापति राजा आज भी जाने से घबराते हैं और भेद रखते हैं यह भी हिंसा है अहिंसा है मन से किसी प्रति द्वेष ना होना भेजना होना समाज और विश्व में अभी अंगुली मानो की कमी नहीं है अंगुली मानव के गलियों की कमी नहीं है लेकिन बुद्ध अंगुलिमाल को बदल सकता है बुद्ध तो ही अंगुली मानो की गलियों में रौनक ला सकता है उपदेश आदेश तो चोर उचक्के माफिया आज भी देना जानते हैं परिवार कुल लोक संस्थाओं के तंत्र को कौन जगह बैठे हैं किसी ने कहा है सरकारें गलत हाथों में रही हैं सताए गलत हाथों में रही हैं सत्ता बाद पूंजीवाद जन्म बाद पुरोहित बाद जन्मजात उच्च बाद जन्मजात निम्न बाद में ईमान को सामने नहीं रखा है गांव और बाढ़ के माफिया दबंग धनबल जाति बल्ला आदि सब किसी नेता के खास दिखे हैं किसी दल के खास देखे हैं सीधे-साधे कानूनी व्यवस्था मानवता आदमी जीने वालों को किस का समर्थन मिलता है उन्हें स्वयं अपने से ही गुजर ना होता है उन्हें कोई पंथ नहीं मिलता आश्रय को किसी ने कहा है भीड़ का धर्म नहीं होता पंथ होते हैं सब प्रकार होते हैं उन्माद होता है जात पात भेदभाव होता है संत परंपरा ही ऋषि मुनियों के संदेश ही ऐसे में हमें विकसित करते हैं कमलेश डी पटेल दास जी कहते हैं वैश्या को भी इंसान समझो कौन क्या कर रहा है कौन क्या कह रहा है यह ना देखकर स्वयं को देखो कि हमें क्या करना है हम क्या कर रहे हैं आचार्य बनो आचार्य बनने से मतलब है जो होना चाहिए वह स्वयं व हम बने सभी के अंतर अंदर ईश्वर की रोशनी महसूस कर सभी उसे प्रेम उदारता नम्रता सेवा भाव के साथ पेश हो । उपदेश आदेश सिर्फ महत्वपूर्ण नहीं ।वातावरण, सत्संग, समीपता आदि महत्वपूर्ण है। सरकारों, जनप्रतिनिधियों, समाजसुधारकों, सेवा समितियों आदि को ऐसा तन्त्र खड़ा करना चाहिए, ऐसे कार्यक्रम तय करने चाहिए ताकि हर जाति मजहब व देश के लोग समीप आना शुरू करें। उपदेशभावेश नहीं आदेश नहीं वरन कार्यक्रम है साथ ही सुकून के लिए विश्व बंधुत्व भाईचारा के लिए साथ साथ रहने के लिए मतभेद और देश के जो विषय हैं वे नजरअंदाज किए हैं। सकारा सकारात्मकता ही बाहर आए श्रीनाथ मुक्ता ही बाहर आए ऐसे कार्यक्रम हूं बड़ी लकीर के सामने सतह बड़ी लकीर खींच ली जाए पहले से मौजूद लकीर मतभेद देश की छोटी पड़ जाए हम प्राइमरी जूनियर क्लासेज में देखते हैं हर जाति मजहब के बच्चे साथ साथ खेलते हैं आचरण करते हैं यह एक अवसर है नई पीढ़ी को मानवता विश्व बंधुत्व की ओर ले जाने का लेकिन हमारे शिक्षक अभिभावक समाज के ठेकेदार इसे खो देते हैं जातिवाद सप्ताह बाद पुरोहित बाद पूंजीवाद माफिया बाद आज नई पीढ़ी की संभावनाओं को कुचल देते हैं। कमलेश डी पटेल 'दाजी' व कुछ अन्य महापुरुष जो समाज को मानवता व विश्व बंधुत्व, विश्व शांति व मानव कल्याण की ओर ले जाना चाहते हैं। बे अब स्कूल और विद्यार्थियों से संपर्क बढ़ा रहे हैं नई दिल्ली के लिए स्कूल ही ऐसे हैं जो मानवता विश्व बंधुत्व विश्व शांति की ओर जाने की संभावनाएं खड़ी कर सकते हैं नई पीढ़ी को हम कैसे कार्यक्रम जीवनशैली कार्यपद्धती आज उत्सव पर इसका निर्धारण अब 'वाद' को ना करने का कानून हर देश में संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव में आकर होना अति आवश्यक है। हम जिएं सब जिएं!! सबका साथ सबकी भागीदारी!! सबकी भागीदारी सबका विकास!! मैं नहीं हम सब!! जय मानवता!जय विश्व बंधुत्व!! जय प्रकृति! जय ब्रह्म!! इच्छाएं नहीं वरन आवश्यकताएं!! 'वाद' नहीं वरन वसुधैव कुटुम्बकम!! क्षेत्रवाद नहीं वरन विश्वबन्धुत्व!! हम और हम सबको अब प्रकृति अंश और ब्राह्मण के आधार पर विचार करना होगा। मानवता और विश्व बंधुत्व के आधार पर विचार करना होगा। अपने घर को सुरक्षित रखने के लिए पास पड़ोस ,पास पड़ोस के लिए वार्ड और गांव को,वार्ड और गांव के लिए जनपद को । जनपद के लिए राज्य को, राज्य के लिए देश या क्षेत्र को, देश या क्षेत्र के लिए विश्व को ध्यान में लाना ही होगा ।इस निमित्त हम सभी रात 9:00 बजे और अन्य समय भी वसुधैव कुटुंबकम, सर्वे भवंतु सुखिनः ,सागर में कुंभ कुंभ में सागर, सभी में ईश्वरीय प्रकाश आदि के भाव आ कर प्रार्थनामय रहते ही हैं इस आधार पर आचरण लाने का प्रयत्न भी करते रहते हैं । किसी ने कहा है भविष्य भारतीयों का ही होगा । विदेशी भी अब भारत की ओर देखने लगे हैं । भारत स्वयं एक विश्व है। भारत है -भा + रत अर्थात प्रकाश मे रत। अनेक जातियों ,पंथ्ओ, भाषाओं के बावजूद उसमें सब को एक साथ रखने की क्षमता है। जिन्हें भारत में डर लगता है वह भी भारत को खोना नहीं चाहते।

सोमवार, 7 जून 2021

सहज मार्ग में मानसिक स्वछता की एक प्रक्रिया::अशोकबिन्दु

 सफाई::अतीत से मुक्ति!!आत्मिक वर्तमान से जुड़ाव की तैयारी। --------------------------------------------------- आरामदायक स्थिति में बैठ जाएं! और मन में भाव लाएं कि पहले के इकठ्ठे विकार, अशुद्धियां, छापें आदि हटायी जा रही हैं। आंखें बंद करें और स्वयं को ढीला छोंड़ दें। अपने मन में अब भाव लाएं कि सारी जटिलताएं और अशुद्धियां आपके शरीर से बाहर को जा रही हैं। अपने सिर के पिछले हिस्से व पीठ पर ध्यान दें। महसूस करें अपने सिर के पिछले हिस्से व पीठ को। सिर से नीचे होते हुए पीठ से गुजरते हुए सारे विकार, अशुद्धियां व जटिलताएं धुआं बन कर कमर के नीचे से बाहर जा रही हैं। बार बार यही। ऐसा बार बार हो रहा है।हमारे सारे विकार,अशुद्धियां व जटिलताएं धुआं बन कर बाहर जा रही हैं। ये प्रक्रिया तेज हो रही है। तेज और तेज! और तेज!! सिर के पीछे व पीठ को ध्यान में रखते हुए मन में भाव रखें - सारे विकार, अशुद्धियां व जटिलताएं धुआं बन कर बाहर जा रही हैं। ये कार्य अब तेजी के साथ होने लगा है। बड़ी तेजी से, बहुत ही तेजी से। और तेजी से । बहुत ही तेजी से हमारे अंदर के सारे विकार, अशुद्धियां, जटिलताएं धुआं बन कर बाहर जा रहे हैं। अपने आत्मविश्वास एवं संकल्प शक्ति के साथ इस प्रक्रिया को तेज करें। तेज और तेज। बड़ी तेजी के साथ हमारे अंदर के विकार, अशुद्धियां, जटिलताएं धुआं बन कर बाहर जा रही हैं। यदि आपका ध्यान भटकता है और अन्य विचार मन में आतें है तो धीमे से फिर से सफाई की ओर ध्यान दें कि हमारे अंदर के सारे विकार, अशुद्धियां, जटिलताएं धुंआ बन कर बाहर जा रहे हैं। इसे बीस तीस मिनट तक करें। हमारा मन, हृदय व शरीर अब हल्का होने लगा है। जब हल्कापन महसूस हो तो सफाई पूर्ण समझें। इसके बाद भाव लाएं कि अंतरिक्ष में तारों, प्रकाशीय तरंगों के बीच से किसी छोर से दुधिया रंग की एक पवित्र धारा हमारे अंदर प्रवेश कर रही है। शेष बची अशुद्धियां, जटिलताएं, विकार को वह बाहर ले जा रही है। अंदर दिव्य प्रकाश, बाहर दिव्य प्रकाश! अंतरिक्ष के किसी छोर से आता दिव्य दूधिया प्रकाश हमारे अंदर प्रवेश कर हमारे रोम रोम को पवित्र कर रहा है।बची खुची जटिलताएं, अशुद्धियां, विकार बाहर जा रहे हैं। अब हम सभी जटिलताओं, अशुद्धियों, विकारों से मुक्त हो चुके हैं। अंदर बाहर प्रकाश ही प्रकाश। दिल ! दिल में दिव्य प्रकाश।दिल में दिव्य प्रकाश मौजूद है।


रविवार, 6 जून 2021

'भूत' का भ्रम व डर में प्रेम?!....अशोकबिन्दु

 'प्रेम' से ये डर खत्म होता है।हृदय क्षेत्र पर इस भाव से ध्यान -' हमारे हृदय में दिव्य प्रकाश उपस्थित है' आंख बंद कर आवश्यक समझते हैं हम।सूफी संतों,सन्तों,ऋषियों मुनियों आदि के सन्देश,जो हमें सनातन ज्ञान की स्थिति में ले जाते हैं-उस पर चिंतन मनन आवश्यक है।हृदय का रुझान ही चेतना जगत ,सूक्ष्म से सूक्ष्म,सूक्ष्मतर से सूक्ष्मतर की ओर हमें ले जा कर 'जीवन अस्तित्व' की ओर ले जा 'डर' से मुक्त कर देता है। संवेदना का जगत सब दीवारें ढा देता है जब हम हार्टफुलनेस ध्यान के माध्यम से अंतर दिव्यता से जोड़ते हैं तो अपनी चेतना को विस्तार का समय देते हैं अवसर देते हैं यह अवसर हमें पास पड़ोस की चेतना फिर जगत की चेतना के अवसर खड़ा करता है ऐसे में हमारी अन्तरत: जगत की मुश्किलों हाड मास शरीर के कष्टों अन्य शरीरों के डर से मुक्त करता है। हमारी रात्रि 9:00 बजे की प्रार्थना हम में विश्व बंधुत्व विश्व शांति अन्य प्राणियों के सम्मान हेतु अवसर देती है ।ये प्रार्थना हाड़ मास शरीर त्याग चुके लेकिन सूक्ष्म शरीर से जीवित प्राणियों को भी शांति सम्मान का अवसर देती है ऐसे में डर का सूक्ष्म वातावरण खत्म होता है और साहसी होने की ओर बढ़ते हैं।जितना हम अपनी आत्मा के प्रकाश को अवसर देंगे, हम साहसी होने को उतना अवसर देंगे।


भेद किधर से आता है?!.....अशोकबिन्दु

 भेद किधर से आता है? एक ब्राह्मण परिवार, समाज की नजर में 'ब्राह्मण परिवार'..?! "तथाकथित ब्राह्मण परिवार"?!मुखिया भंगड़ी अर्थात भांग के नशे में व्यस्त। बड़ा लड़का धीरे-धीरे बड़ा हुआ ,उसने लैबरी, साइकिल पिक्चर मरम्मत आदि के सहारे गृहस्थी को आगे बढ़ाना शुरू किया।उसके छोटे-छोटे अन्य पांच भाई, बड़ी बहने, जैसे-जैसे बहनों की शादी निपटा दी। भाइयों को लिख पढ़ लेने भर तक का पढ़ाकर शादियां कर दी। लेकिन अब सभी भाइयों की पत्नी?! उसके पत्नी नहीं उसकी शादी नहीं। रिश्ते आए थे तो कुल देखना, ऊंच-नीच देखना। अब कोई कुल नहीं, कोई ऊंच-नीच नहीं ।बस ,कोई मिल जाए जो घर में टिक जाए ।खाना बनाकर खिला दे। ऊंच-नीच कब नहीं? कुल मर्यादा कब नहीं ?और हिंदू भी यार मुस्लिम भी यार... व्यापार,दारु मीठ, मतलब ...आदि,न हिंदू न मुस्लिम ....लँगोटी यार..?!मौका लगे तो एक दूसरे की बिरादरी की लड़कियों और औरतों से शारीरिक मतलब निकालने की भी कोई कसर न छूटे। लेकिन मजहबी करण कहां पर? और क्यों मानवता के लिए एक नहीं हो सकते? प्रकृति संरक्षण और धरती को बचाने के लिए, विश्व बंधुत्व के लिए एक नहीं हो सकते? भेद क्यों? जब दुनिया को खुदा ने बनाया है तो खुदा की बनाई दुनिया में नफरत, भेद ,हिंसा क्यों? हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला में कोई लोक और कुल मर्यादा नहीं ।न जात पात न छुआछूत । भक्त मीरा की भक्ति में न कोई कुल मर्यादा न ही लोक मर्यादा। सूरा 01,अल-फातिहा (मक्का में उतरी-आयतें 07) अल्लाह के नाम से; जो बड़ा कृपा शील, अत्यंत दयावान है। 01.प्रशंसा अल्लाह ही के लिए जो सारे संसार का रब(प्रभु, पालनकर्ता)है। 02.बड़ा कृपाशील,अत्यंत दयावान है। 03.बदला दिए जाने के दिन का मालिक है। 04.हम तेरी ही बन्दगी करते हैं और तुझी से मदद मांगते हैं। 05.हमें सीधे मार्ग पर चला। 06.उन लोगों के मार्ग पर जो तेरे कृपापात्र हुए। 07.जो न प्रकोप के भागी हुए और न पथ भ्रष्ट। इस साथ आयतों से हमें क्या संदेश मिलता है ? हमारी वर्तमान समझ( समझ के भी अनेक स्तर हैं वर्तमान समझ से पहले हमारी समझ के अनेक स्तर थे भविष्य में भी अनेक होंगे) से हमें इन सात आयतों से संदेश मिलता है। सिर्फ ईश्वर ही प्रशंसा के योग्य है,इसके सिवा कोई नहीं। वही बड़ा कृपाशील, अत्यंत दयावान है।अर्थात हमें सदा उसी की शरण में रहना चाहिए। समाज और समाज में किसी व्यक्ति स्त्री आदि से कोई उम्मीद नहीं रखना चाहिए । बरन सुप्रबंधन और कर्तव्य निष्ठा के लिए जीवन जीते रहना चाहिए। वह ईश्वर ही बदला लेने वाला है, बदला लेने का मालिक है, वही ही बदला दिए जाने के दिन का मालिक है। इसकी प्रेरणा हमें मोहम्मद साहब के जीवन के उस घटना से मिलती है, जिसमें उनपर कूड़ा फेंकने वाली औरत का वर्णन है। यह संसार तो कर्म भूमि है, संसाधन और माध्यम है। हम तो उस ईश्वर से ही मांग सकते हैं। परम + आत्मा = परम आत्मा ! हम अपने अंदर की दिव्य शक्तियों को अवसर देंगे । हे ईश्वर ! हम तेरी ही बंदगी सिर्फ करने का संकल्प लेते हैं ।तुझसे ही हम सिर्फ प्रार्थना कर सकते हैं। जीवन पथ सहज है ,सरल है ,शाश्वत है। जो सीधा है। नैसर्गिक है ।जगत और ब्रह्मांड में हम मनुष्य को छोड़कर सभी नियम पर हैं । हमें भी उसी सीधे मार्ग पर चला जो स्वतः, निरंतर है ,सदा है । जिस पर चलकर जो तेरे कृपा के पात्र हुए ,हमें उस मार्ग पर चला । उस मार्ग पर चलने वाले किसी भी प्रकोप के भागी नहीं होते और न ही पथभ्रष्ट ।हमारे हाड मास शरीर में स्थित अल्लाह का नूर....!! कुर आन में अल-बकरा की 8वीं आयत में जो कहा गया है, उसका हिंदी में मतलब है- " कुछ लोग ऐसे है जो कहते हैं कि हम ईश्वर और अंतिम दिन पर ईमान रखते हैं हालांकि वे ईमान नहीं रखते हैं ।" आगे नवमी आयत में -"वे ईश्वर और इमान वालों के साथ धोखेबाजी कर रहे हैं । हालांकि धोखा वे स्वयं अपने आप को ही दे रहे हैं परंतु वे इसको महसूस नहीं करते ।" 16 वीं आयत कहती है-" यहीं वे लोग हैं जिन्होंने मार्गदर्शन के बदले में गुमराही मोल ली किंतु उनके इस व्यापार ने न कोई लाभ पहुंचाया और न ही वे सीधा मार्ग पा सके ।" इन आयतों को पढ़ने के बाद हम में चिंतन आया- आज हम वह नहीं हैं जो सृष्टि के वक्त थे अंतिम दिन अर्थात मृत्यु के वक्त या कयामत के समय पर हम क्या होंगे? गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि मृत्यु (हाड मास शरीर की मृत्यु) वक्त हम नजरिया से और दिल से जो होते हैं वही के आधार पर हमारा अगली यात्रा का या अगले जीवन का फैसला होगा ।हम अपने इस शरीर में स्थित आत्मा और आत्मा के गुणों से कितने दूर हो चुके हैं? ऐसे में ये हाड़ मास शरीर की मृत्यु के बाद भी अपने सूक्ष्म शरीर के माध्यम से नरक योनि, भूत योनि, पितर योनि आदि भोगते हैं। मोक्ष की लालसा रखने के बावजूद भी तब मोक्ष नहीं पाया क्योंकि उन्होंने सृष्टि के वक्त की अपनी मूल अनंत प्रवृत्तियों से संबंध को तोड़ इंद्रियों, हाड मास शरीरों,कामनाओं में अपने को लगा दिया।अनेक तो कहते हैं कि बुढ़ापे पर ईश्वर को याद कर लेंगे लेकिन बुढ़ापा आने से पहले ही आदतें मन में इतनी गहरी हो गई कि छोड़ें छुट्टी नहीं जो आंख बंद कर या कैसे भी ईश्वर की याद में रहकर कार्य करते हैं ,आचरण करते हैं, उनकी मजाक करते रहे ।घर बार छोड़ सन्यासी होने का उपदेश देते रहे। लेकिन अब बुढ़ापे पर वही अच्छे लगने लगे जो जवानी में ही और किशोरावस्था में ध्यान ,योग आदि करने लगे थे मालिक की याद में रहने लगे थे । अब बुढ़ापे पर महसूस होता है कि हम स्वयं अपने को धोखा देते हैं। उनको हम ढोंगी पाखंडी मांगते रहे जो ईश्वर की याद में जीते थे या मेडिटेशन आदि करते थे ।जाति मजहब को नहीं मानते थे। कुल और लोक मर्यादा को भक्त मीरा की भांति भूल गए। वे सारा संसार,हर प्राणी और वनस्पति में ईश्वर का प्रकाश, संवेदना,चेतना महसूस करने की ओर बढ़ चले थे। प्रकृति और ब्रह्म दो रूप में ही उनका सिर्फ द्वैतवाद था ।आगे चलकर - सागर में कुंभ कुंभ में सागर का भाव। कैसी हिंसा? कैसा भेद? कैसी नफरत? जब दुनिया को बनाने वाला है कोई या हमारे और दुनिया के अस्तित्व का कारण है कोई तो उसके सामने हमारी क्या औकात? हम कौन होते हैं? अपने स्वार्थ ,इच्छाओं के लिए हिंसा, द्वेष, भेद फैलाने वाले हम कौन होते हैं? सबका अलग-अलग स्तर है। हर कोई अपने स्तर के आधार पर आचरण करता है। हम उनके आचरणों में खो कर अपने विकास को क्या अवरुद्ध नहीं कर लेते ?ऑल (अल,all,सम्पूर्णता) से जुड़ने का अवसर क्या खो नहीं देते?अपनी चेतना के विस्तार का अवसर क्या खो नहीं देते?


भेद में जीना हमारी नास्तिकता ही::अशोकबिन्दु

 हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, देशी, विदेशी आदि की भावना में रहकर समाज व कुदरत को अनेक खेमों में मत बांटों।सदियों पुराना ये विभाजन अब भी बर्दाश्त कर रहे हो,अन्यथा इसे आगे भी बर्दाश्त करोगे।इसकी सजा कुदरत देगी। हजरत क़िब्ला मौलबी फ़ज़्ल अहमद खां साहब रायपुरी ने कहा है-कुदरत हर वक्त हम पर मेहरबान है।हम उसके बन्दे हैं।लेकिन जब बन्दों से खिलबाड़ होने लगता है तब कुदरत चुप नहीं बैठती। वेदों में 'हमें मनुष्य होने', मनुष्य होने के बाद'श्रेष्ठ' होने की बात कही गयी है।इसका मतलब है-हम अभी 'मनुष्य' नहीं हुए हैं।हम अपनी 'श्रेष्ठता' किसकी नजर में साबित करना चाहते हैं?अपने'स्व' को समझो।अपने आत्मीयता, आत्मा को समझो।अपने आत्म सम्मान, आत्मविश्वास को समझो।पाकिस्तान में कोई वह व्यक्ति शोषित होता है, उसकी बेटियों के संग दुराचार होता है तो उसके प्रति आत्मीयता क्यों नहीं जगती?आपके समाज में'कम आबादी वाला'-या -'अकेला व्यक्ति'-परेशान होता है, तो उसके प्रति आत्मीयता क्यों नहीं उठती?कैसी आस्था?कैसी आत्मीयता?आस्था को समझो, आत्मीयता को समझो। जगदीश चंद्र बोस क्या कहते हैं ?पेड़ पौधों में स्थूल दिल नहीं होता लेकिन संवेदना होती है ।हम अपने को महसूस नहीं करते, अपनी चेतना को महसूस नहीं करते ,हम अपनी आत्मा को महसूस नहीं करते, हम अपना अस्तित्व महसूस नहीं करते हम जगत मूल, परम आत्मा को क्या महसूस करेंगे? अन्य प्राणियों और वनस्पतियों की चेतना और संवेदना को क्या महसूस करेंगे ?यह महसूस करना ही हमें सार्वभौमिक ज्ञान की ओर ले जाता है, सनातन स्थिति की ओर ले जाता है, वेद की स्थिति की ओर ले जाता है। वेदों का जब बुद्ध ने विरोध किया और जनता को 'स्व' को महसूस करने का रास्ता दिया तो आपके पूर्वजों ने उन्हें अनीश्वरवादी कह डाला। आज आप सनातन की बात कितना भी करते हो आपके आचरण, सोच ,कथन क्या वैदिक हैं?


शुक्रवार, 4 जून 2021

05जून :: विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष::अशोकबिन्दु

 05जून::विश्व पर्यावरण दिवस!! . . #अशोकबिंदु " ऋषि परम्परा के बाद आचार्य परम्परा महत्वपूर्ण है।आचार्य का मतलब है-ऋषियों की परंपरा के आधार पर आचरण करने वाला।कहने को तो सभी ऋषियों की संतानें हैं लेकिन तब भी कोई असुर हुआ कोई सुर.....आखिर क्यों?!" आज 05 जून, अनेक संस्थाएं विश्व पर्यावरण दिवस मना रही हैं। हमें चारों और जो भी दिखाई दे रहा है सब प्रकृति है हमारा इस शरीर शरीर के लिए आवश्यक तत्व हमें प्रकृति से ही प्राप्त होते हैं प्रकृति और ब्रह्मांड में सब कुछ नियम से बंधा हुआ है मानव मानव के समाज ही सरल सहज नैसर्गिक ता प्रकृति अभियान यज्ञ से हटकर भौतिक बनावट में उलझ गए है। अपने इस शरीर में अपने जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रकृति से दिव्य संबंध भाव ही आचरण ही मंगलकारी हैं। मैं हूं क्योंकि हम सब हैं यह प्रकृति है मानवता है सहकारिता है आदि आदि बेहतर वातावरण के लिए आवश्यक है कि हम हमारा मनुष्य जीव जंतुओं पेड़ पौधों धरती के प्रति सद्भावना हो सम्मान हो इसके लिए अध्यात्म को स्वीकार करना आवश्यक है हमें सार्वभौमिक ज्ञान को हर वक्त चिंतन मनन कल्पना स्वप्न में रखना आवश्यक है यही हमारी हमारे लिए बेहतर उप आसना है उप आसन है हमारे लिए उप आसन है मन को दिव्यता सार्वभौमिक ज्ञान और सार्वभौमिक प्रार्थना में रखना । हम इन विचारों को हर वक्त अपने चिंतन मनन कल्पनाओं सतत स्मरण में रखकर ही महानता दिव्यता इस भक्ति को सिद्ध कर सकते हैं कि- " हम सब में ईश्वर की रोशनी मौजूद है अल्लाह का नूर मौजूद है हम सब आत्माओं के रूप में अनंत यात्रा में परस्पर साहचर्य हैं जैसे सागर में परस्पर लहरें हम सब एक प्रकार से अनंत व्यवस्था प्रकृति अभियान यज्ञ का परिणाम है जगत में जो भी स्त्री पुरुष हैं सब भाई बहन है सब एक ही मिशन से जुड़ रहे हैं सभी के दिल में धर्म दया सेवा प्रेम वसुधैव कुटुंबकम विश्व बंधुत्व परस्पर सहयोग की भावना मौजूद है । " सारा जगत और ब्राह्मण एक तंत्र का हिस्सा है जिसकी एक इकाई हम भी हैं जिससे हम हम से प्रभावित होता है बीमारी क्या है बी अर्थात प्रकृति में असंतुलन हमारा शरीर भी प्रकृति है जिसमें असंतुलन ही बीमारी है स्वास्थ्य है संतुलन। प्रकृति, अपने शरीर, अन्य शरीर शरीरों से सम्मानजनक व्यवहार रखकर ही हम अपने में स्व में स्थित रह सकते हैं स्वस्थ रह सकते हैं प्रकृति जगत की हो या अपनी यदि हम उससे लोग लालच भोग विलास के लिए संबंध रखें रखेंगे तो हम वास्तव में असुर संस्कृति बेड संस्कृति को ही प्रतिष्ठित कर रहे हैं हमारी और जगत की प्रकृति जब तक संतुलित है संरक्षित है तब तक ही हम स्वस्थ हैं हम जीवित हैं हम जीवंत हैं ऐसे में हमें ऋषभदेव जड़ भरत आदि ही याद आते हैं जिन्होंने सत्य अहिंसा अस्तेय अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य को ही सिर्फ महाव्रत बताया है जिसके माध्यम से ही हम अपनी और जगत की प्रकृति को सुरक्षित रख सकते हैं हमें रक्ष संस्कृति को भी समझने की जरूरत है दुर्ग संस्कृति को भी समझने की जरूरत है। वर्तमान विकास विकास नहीं है बरन विनाश है मन आत्मा और अनंत वैभव तो निरंतर हैं गतिशील है बाहर का वक्त नहीं विकसित नहीं बरन विकास शीलता है निरंतर अभ्यास है निरंतर गतिशीलता है जीवन भर रोटी कपड़ा मकान जातिवाद मजहब बाद धर्म स्थल बाद आदमी लगे रहना प्रकृति की नजर में प्रकृति अभियान की नजर में रुकावट है जहां रुकावट है वहां निरंतरता नहीं है सनातन नहीं है। हाड़ मास शरीर, शरीरों की प्रकृति बदलती रहती है। लेकिन हमारे और जगत की प्रकृति के अंदर कुछ है जो स्वतः है, निरन्तर है, जैविक घड़ी है।वह हमें अनन्त, शाश्वत व सनातन से जोड़ता है।इसके लिए हमे सबका सम्मान आवश्यक है।सबका साथ सबका विकास आवश्यक है।सभी के अंदर दिव्य सम्भावनाएं है, उनको अवसर आवश्यक है। "यथा राजा तथा प्रजा!" सहज मार्ग राजयोग में हमारा मन ही राजा है जैसा मन होगा जैसा हमारा नजरिया होगा जैसा हमारा अचेतन मन होगा जैसा हमारा चिंतन मनन स्वप्न होगा वैसा ही हमारा भविष्य होगा। इस कोरोना संक्रमण काल ने हमें एक प्रमाण पत्र दे दिया है अब उसे हम ना समझ पाए तो अलग बात। लगभग 1 साल पहले 22- 25 मार्च 2020 को यदि आप प्रकृति में शांति सुकून नहीं किए हैं तो समझो अभी आप की समझ और चेतना का स्तर क्या है आपका आपकी और जगत की प्रकृति से कैसा और क्या संबंध है? श्री अर्धनारीश्वर शक्ति पीठ, बरेली के संस्थापक श्री राजेन्द्र प्रसाद सिंह भैया जी कहते हैं- " हम सबका धर्म सिर्फ संबंध है प्रकृति से संबंध जीव-जंतुओं वनस्पतियों से संबंध अध्यात्म है सभी के अंदर ईश्वर के प्रकाश को देखना। मानवता है सभी मनुष्यों के बीच परस्पर प्रेम भाव सहकारिता सहयोग भाव आदि यह सब मिलकर ही हम सनातन होते हैं।" हम तो कहेंगे अन्यथा यह सीखने से कोई फायदा नहीं कि हम सनातनी हैं। धार्मिक अनुष्ठानों में चीखने से काम नहीं होगा सिर्फ,..... जगत का कल्याण हो .....सर्वे भवंतू सुखिना.... वसुधैव कुटुंबकम .....आदि आदि। ऋषि परंपरा के बाद आचार्य परंपरा ही महान है। आचार्य का मतलब है -ऋषि यों की परंपरा के आधार पर आचरण। कहने को सभी ऋषियों की संताने हैं लेकिन तब भी कोई असुर हुआ कोई सुर..... आखिर क्यों? 22- 25 मार्च 2020 को प्रथम बार लॉक डाउन ने हमें प्रेरणा दी कि हम सब चाहे तो धरती को सुंदर बना सकते हैं। 22- 25 मार्च 2020 को हमने प्रकृति की ओर से महसूस किया कि प्रकृति कितनी प्रसन्न है? हम तो यही कहेंगे कि सप्ताह में 2 दिन लॉक डाउन हमेशा के लिए सरकारों के द्वारा तय हो ही जाना चाहिए । प्रकृत में कोई समस्या नहीं है। समस्या स्वयं मानव और मानव समाज की विभिन्न आदतों के कारण है।किसी ने कहा है कि यदि कुछ वर्षों के लिए धरती के सभी मानवों को आकाश की अन्य धरती पर भेज दिया जाए तो इस धरती की सभी समस्याएं खत्म हो जाएंगी। इस धरती के लिए सबसे बड़ा खतरा अब मानव सत्ता ही है । इस धरती के लिए ही नहीं वरन ऐसा ही रहा तो पूरी आकाशगंगा के लिए । इजरायल के प्रधानमंत्री ने अभी जल्द महीनों ही कहा है कि अमेरिका का संबंध एलियन से हो चुका है, हम तो 10 साल पहले से ही ताल ठोक कर यह कहते आए हैं। एक देश के विदेश मंत्री का यहां तक कहना है कि भविष्य में एलियंस इस धरती पर आकार आक्रमण कर सकते हैं। कारण यह है कि इस धरती की मानव सत्ता ने अंतरिक्ष की प्रकृति को भी प्रभावित कर दिया है। "बड़े भाग्य मानुष तन पावा??" हम समझते हैं कि हम से बढ़कर कोई नहीं लेकिन ऐसा नहीं है। हम भी प्रकृति का हिस्सा है । इन शरीरों के रूप में प्रकृति की मार में हमारे यह शरीर कब तक धरती पर विचरण कर पाएंगे? पूंजीवाद ,सत्ता वाद, अब एलोपैथी चिकित्सा प्रकृति और प्राकृतिक चिकित्सा के खिलाफ ही खड़ी है। कोरोना संक्रमण प्रकृति में हमारी प्रकृति का प्रमाण पत्र है 1 साल में ऐसे अनेक प्रमाण मिले हैं जो आयुर्वेद,योगा ,प्राकृतिक जीवन से जुड़े हैं कोरोना उन्हें छू कर आगे निकल गया है। हमें प्रसन्नता है इन दिनों योगा ,ध्यान , आयुर्वेद का प्रसार और तेज हुआ है । जब जागो तभी सवेरा! हम प्राकृतिक सहजता के संरक्षण में आगे आए।प्रकृति को बचाएं। जय प्रकृति!! #अशोकबिन्दु #अशोकबिन्दु