रविवार, 19 जून 2022

हमारी नजर में योग/सम्पूर्णता/आल/अल....#अशोकबिन्दु

 21 जून :: विश्व योगा दिवस!?हमारी नजर में योग::अशोकबिन्दु



हमारी नजर में योग /आल/अल/सम्पूर्णता है वह स्थिति जो यथार्थ है।सामने जो है सो है।वह का पैमाना हमारा भ्रम, पूर्वाग्रह, जटिलताएं आदि नहीं है। योग की शुरुआत सत्य/यथार्थ से होती है। 


सत्य/यथार्थ

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 यम/महाव्रत का पहला चरण

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यम/महाव्रत

(सत्य,अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह व ब्रह्मचर्य) 

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योग के आठ अंग

(यम, नियम, आसन, प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा, ध्यान व समाधि)



ऐसे में अपना व जगत का सत्य उजागर करने के लिए या महसूस करने के लिए भ्रम, पूर्वाग्रह, जटिलताओं आदि से मुक्ति आवश्यक है। इसके लिए हम सब सफाई करते हैं।प्रतिदिन  दिन भर के सभी दैनिक सांसारिक कार्य निपटा कर।


https://youtu.be/L2Ie7-00Qv4


जो है सो है।हम व यह जगत क्या है?उसे हम मौन में जाकर ही जान सकते हैं।अंतर्मुखी होकर ही जान सकते हैं।हमारे व जगत के अंदर जो स्वतः, निरतंर, अनन्त, सावभौमिक है ।उसे हम मौन रह कर ही जान सकते है।एक विशेष प्रकार का विचार व भाव लेकर।



https://youtu.be/hf8_OPWGPtg


अपने लिए जिओ, खूब जियो। अपनी आवश्यकताओं के लिए जीना चाहिए।व्यवस्थाप्रियता हममें होनी चाहिए लेकिन व्यवस्था भी तीन प्रकार ही होती है-स्थूल, सूक्ष्म व कारण।लेकिन हम तो इससे हट कर कृत्रिमताओं में जीते हैं। हम ठीक से अपनी आवश्यकताओं के लिए भी नहीं जीते, अपूर्णता में जीते है।आवश्यकताएं भी तीन प्रकार की हैं-स्थूल, सूक्ष्म व कारण।लेकिन यहां भी हम कृत्रिमताओं के लिए जीते हैं। हम अपने हाड़ मास, भौतिक वस्तुओं तक सीमित रह जाते हैं। हम अपने सूक्ष्म व कारण के लिए नहीं जीते।


ऐसे में योग है - संतुलन।अपने व जगत के सम्पूर्णता के अहसास में जीना।



हमारे वैश्विक मार्गदर्शक श्री कमलेश डी पटेल #दाजी ठीक कहते हैं कि महत्वपूर्ण यह नहीं है कि हम आस्तिक हैं या नास्तिक ,महत्वपूर्ण यह है कि हम महसूस क्या करते हैं?अनुभव क्या करते है?आभास क्या करते हैं? ......शिक्षा व प्रशिक्षण कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है। जो हम वास्तव में दिल, आस्था ,नजरिया से होते हैं वही हमारी वर्तमान में असलियत है।जिससे हमें ऊपर उठने की जरूरत है।


#अशोकबिन्दु #हार्टफुलनेस



https://youtu.be/wqfMSc3HNoY





गुरुवार, 2 जून 2022

एक कदम आगे और..?!#अशोकबिन्दु

 02 जून 2022 ई0!!

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विश्व हिंदी अध्यात्म साझा प्रचारक! 


विश्व सम्विधान विश्व सरकार  


एक कदम और हम चले...... 


कान्हां शान्ति वनम हैदराबाद में दो साल पहले रामदेव बाबा घोषणा कर चुके हैं कि आगामी जो आध्यात्मिक क्रांति होगी वह यहीं से होगी, कान्हा शांति वनम से। 


उसी रूहानी आंदोलन के तहत एक कदम आज!! 


हम अपने मन-भूमि पर खेले गये 1990 से खेल को पृथु-भूमि/महि पर अब विस्तार लेते देख रहे हैं। 


हम महसूस कर रहे हैं कि कैसे विश्व स्तर की सूक्ष्म शक्तियां  अब वह माहौल बनाने में सहयोग कर रहीं है जो विश्व को विश्व बंधुत्व, बसुधैव कुटुम्बकम ,विश्व सरकार/लोहिया के विश्व संसद, नई संसद आदि की ओर प्रेरित कर रहीं हैं।


वैचारिक क्रांति, मानसिक क्रांति के परिणाम तुरंत नहीं घटित होते लेकिन होते हैं। हमारे पोस्टस से आप सब महसूस करते रहते होंगे।लेकिन कौन महसूस कर सकते हैं?


आज का दिन इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन घटित हो चुका है।


हम फिर कहना चाहेंगे कि विश्व में कौन है जो विश्व बंधुत्व, बसुधैवकुटुम्बकम की बात करता है?!दुनिया जानती है।लोभी, मजहबी, जातिवादी की कब तक चलेगी?


#अशोकबिन्दु


मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

मजहबी - जातिवादी हवा के बीचविश्व बंधुत्व, बसुधैवकुटुम्बकम ,विविधता में एकता आदि ?!

 विविधता में एकता महसूस करने वाले कितने हैं?

सब के सब अपनी जाति, अपने मजहब पर गर्व करते फिर रहे हैं।

उनको कितना फॉलो किया जा रहा है कि पहले हम इंसान है बाद में कुछ और?!


सन 2041ई0!!

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मुसलमान+यादव+जाटव+आदिबासी+खानाबदोश+पिछड़ा+जनजाति+दलित =??



सवर्ण सेना जिंदाबाद!!जिंदाबाद!जिंदाबाद!!


ब्राह्मण सेना जिंदाबाद!!जिंदाबाद!!!


वैश्य समाज !!!जिंदाबाद!! जिंदाबाद!!



जय परसुराम !!जय जय परसु राम!!


गर्व से कहो हम हम ब्राह्मण हैं!!


गर्व से कहो हम ठाकुर हैं!!



साथियों! जो दलितों, आदिबासियों आदि के लिए अवसर न दे सके उस तन्त्र को उखाड़ फेंको।



फ्रांस की क्रांति में तृतीय एस्टेट अर्थात जन साधरण के प्रतिनिधियों  की सभा ने मिराब्यो  आदि के नेतृत्व में खुद को राष्ट्रीय सभा घोषित कर सिस्टम में कमियों के खिलाफ मुहिम छेन्ड़ दी थी। अब फिर ऐसा करने की आवश्यकता है। जो सिस्टम हमें अवसर न दे सके वह सिस्टम उखाड़ फेंको। जनतन्त्र में जनता शासक होना चाहिए।जन तन्त्र का मतलब जातीय समीकरण नहीं है।जनता के हित में कार्य करने वालों का समर्थन है।किसी जाति मजहब को बढ़ावा देना नहीं है।


जैसे फ्रांस की क्रांति के समय  शासक, पूंजीपति, सामंतवादी, सरकारी कर्मचारी ,पुरोहित आदि मौज में थे लेकिन 94 प्रतिशत जनता परेशान, उस पर टैक्स पर टैक्स!?आज कल भी क्या हो रहा है? मंहगी शिक्षा, मंहगा इलाज, मंहगा न्याय, समाज व राजनीति में ,धर्म।के।क्षेत्र में कुछ लोग हैं जो नहीं चाहते कि हम से ऊपर कोई आगे बढे। ऐसे सिस्टम को उखाड़ फेंकने की आवश्यकता है।

सबका साथ सबका विकास सबकी भागीदारी!!

कम आबादी वालों को भी अवसर की जरूरत!!



हर सीट पर जो कम आबादी के लोग हैं, समाज के लिए बेहतर सोंच रखते है-जनतंत्र का मतलब यह नहीं है कि उनको समर्थन न मिले?और उनको समर्थन मिलते हुए  भी उनको महत्व न मिल सके तो ऐसे तन्त्र को उखाड़ फेंको।


जय हो  सम्विधान प्रस्तावना!!जय हो भारतीयता!!



शनिवार, 26 मार्च 2022

पदार्थवान से ऊर्जावान ?! हमारा वैदिक ज्ञान सुप्रीम साइंस::अशोकबिन्दु

   जब भी हम रामचरितमानस उठाते हैं, तो उत्तर कांड को खोलते हैं।जिसमें स्पष्ट है कि रोग व दुःख का कारण क्या है?सगुण व निर्गुण कोई न भेदा..... ?!


      एक समय वह भी था जब विज्ञान पदार्थवाद  पर केंद्रित था। अब विज्ञान काफी आगे निकल चुका है और सुप्रीम साइंस आत्मा विज्ञान की ओर आ गया है, आध्यत्म की ओर आ गया है। एक वैज्ञानिक तो कहता है कि हमें तो ईंट पत्थर में भी रोशनी दिखाई देती है। कोई कहता है कि जो दिख रहा है वह ही सच नहीं है।सारा जगत, ब्रह्मण्ड प्रकाश, ऊर्जा, कम्पन, स्पंदन आदि में है। सहज मार्ग में जो रहस्य उजागर किया गया था, वह की ओर अब साइंस भी बढ़ चला है।



   हमारा वैदिक ज्ञान सुप्रीम साइंस है।वेद मात्र पुस्तक नहीं हैं। श्री रामचन्द्र जी महाराज कहते हैं कि वेद एक वह शाश्वत व अनन्त व्यवस्था है जो ऋषियों -नबियों में पहले उतरी।जिन्होंने देखा कि सृष्टि व प्रलय, वर्तमान में हमारे अंदर व जगत- ब्रह्मण्ड के अंदर क्या दशा है?जो स्वतः है, निरन्तर है, अनन्त है।जिसका केंद्र हमारा हृदय है।जहां स्पंदन, कम्पन है, अनन्तता है।





 जगत में जो भी दिख रहा है,वह अनन्त यात्रा का हिस्सा है। गीता का विराट रूप भी यही सन्देश देता है।कुंडलिनी जागरण व सात शरीर का अध्ययन या कल्पना भी हमें यही संदेश देता है। अनन्त यात्रा का अध्ययन, सहज मार्ग का दिग्दर्शन का अध्ययन ,कल्पना भी हमें यही सन्देश देता है। हम किशोरावस्था से ही कुछ अद्भुत सन्देश प्राप्त होते रहे हैं।हमारे अंदर जो आकाश तत्व है, वहां हमें निरन्तर सन्देश प्राप्त होते रहते हैं।लेकिन हम उसे जगत व बनावटों की चकाचौंध में नजरअंदाज कर दें ,यह अलग बात।


हमारे वर्तमान वैश्विक मार्गदर्शक कमलेश डी पटेल दाजी कहते हैं कि महत्वपूर्ण यह नहीं है कि हम आस्तिक हैं कि नास्तिक, महत्वपूर्ण यह है कि हम महसूस क्या करते हैं?अहसास क्या करते हैं? अमेरिका में सहज मार्ग में एक अभ्यासी कहते हैं कि साधना में सफलता का मतलब है कि हमें अपने आस पास सूक्ष्म शक्तियां, चेतना का आभास होने लगे।मूर्ति पूजा का मतलब यह भी है कि हमें सिर्फ पदार्थ, शक्ल सूरत, व्यक्ति की स्थूल क्रियाएं ही हमें सिर्फ दिखती हैं।



हम बचपन से ही बाला जी की मढ़ी आदि पर आखँ बंद कर,ब्रह्म नाद करते वक्त अपने अंदर व आस पास अतिरिक्त ऊर्जा,कम्पन, स्पंदन आदि महसूस करते रहे हैं। 



वास्तव में प्रेम भी क्या है?सर्वव्यापकता।।

सागर में कुम्भ कुम्भ में सागर......


(अपूर्ण)

शनिवार, 26 फ़रवरी 2022

जय दक्षेस!!

 दक्षिण एशियाई देशों को गिले सीकबे भुला कर एक जुट होने की जरूरत है।


चीन व पाकिस्तान को शांति सुकून से काम चलाने की जरूरत है।


हम तो कहेंगे कि भविष्य में अर्थात तृतीय विश्व युद्ध के अंत में भारत  , चीन व रूस एक साथ होंगे लेकिन तब तक काफी बर्बादी हो  चुकी होगी।  



यदि हम सब मानवता का भला चाहते हैं तो निजी स्वार्थों का त्याग करना होगा

किस किस से प्यार करूँ?किस किस से नफरत?..#अशोकबिन्दु

 जब बसुधैब कुटुम्बकम, विश्व बंधुत्व, सागर में कुम्भ कुम्भ में सागर तो किससे नफरत?किससे मोहब्बत?


न काहू से दोस्ती न काहू से बैर!!



दुनिया व ब्रह्मण्ड में वह प्राणी खतरनाक है जो इंसान माना जाता है लेकिन इंसानियत नहीं रखता।


हमारे आस पास, नगर गांव में, प्रदेश व विश्व में कुछ लोग ऐसे हैं जो मानव समाज के लिए खतरा हैं। वे अपने मजहब व जाति के लिए मानवता व रूहानी आंदोलन को ताख पर रख देते हैं। उनमें ऐसा कोई नेता व उनका कोई देश(उनकी आबादी वाला क्षेत्र) है जिसमें इंसानियत व रूहानी आंदोलन फलता फूलता है?गैर मजहबी अकेला इंसान मौज से रह रहा हो?जो सबके भलाई के लिए सोचता हो?



ऐसे में दुनिया की निगाहें किधर होंगी?😢


हम सब को समझना चाहिए कि हमारा हाड़ मास, दिल दिमाग, आत्मा, हवा, पानी आदि का कोई न मजहब है न कोई जाति।

भारत ही एक ऐसा देश है जो सबके हित की बात सोंच सकता है।विश्व बंधुत्व, बसुधैव कुटुम्बकम, विश्व कल्याण की बात सोंच सकता है।दुनिया में अधिकतर देश अपने हित में किसी को भी तोड़ सकते हैं।

लोग अधर्म करते करते इतना गिर जाते हैं कि वे किसी को अपना नहीं मानते न ही सबका हित साधना चाहते हैं।भारत ही ऐसा देश है जो सबका हित साधते हुए अपना हित साधना चाहता है। 


मुस्लिम देश हो यूरोपीय देश अधिकांश ऐसे हैं जो विश्व बंधुत्व, विश्व कल्याण की बात नहीं सोंच सकते ।न ही उनका कोई ऐसा नेता है जो सबका कल्याण की बात सोंचे। अब वक्त आ गया है कि एशिया के देश एक जुट हों।व7शेष कर पाकिस्तान, भारत, चीन, बांग्लादेश ,श्री लंका आदि एक मंच पर आये।यदि वे अपने अपने जनता व क्षेत्र का भला चाहते हैं। #अशोकबिन्दु


https://fb.watch/bqx3I5hcHe/



रविवार, 24 अक्टूबर 2021

नजरिया व आस्था::अचेतन मन!!

 किसी संस्था या व्यक्ति को नजरिया ही महान बनाता है:::अशोकबिन्दु

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हमारा मानना है कि व्यक्ति का नजरिया व आस्था काफी महत्वपूर्ण है।सिर्फ कर्म ही नहीं।हमने लेबर वर्ग के लोगों को देखा है वे बड़े मेहनती होते हैं।हमसे ज्यादा कार्य व मेहनत करते है लेकिन वे महानता को नहीं बुनते। वे कठिन कार्य करते है, काम में जुटे रहते हैं।लेकिन मालिक उन्हें रुपया देता है, घर न जाकर सीधे मधुशाला पहुंच जाते हैं।जिन रुपयों से वे घर का छह सात दिन रोटी पानी चला सकते हैं, उसे कुछ मिनटों में खर्च कर देते हैं।और उनके बच्चे?!उनके पास बच्चों के प्रति कोई योजना नहीं होती। हम देखते हैं अनेक लेबर व्यक्ति हमसे दूना कमाते हैं, लेकिन उनके घर व बच्चों के लिए व्यवस्थाएं हमसे बेहतर नहीं होती।हम कर्म को ही नहीं वरन आस्था व नजरिया को महत्व देते रहे हैं।



किसी संस्था में अनेक लोग कार्य करते दिखते हैं लेकिन संस्था के लिए उनका नजरिया व आस्था महत्वपूर्ण होता है।संस्था में कार्य करने वाले अनेक तरह के होते हैं।यहां तक कि हमें आश्चर्य होता है कभी कभी उनको देख कर जो संस्था में खास होते हैं। 



किसी संस्था में उपस्थिति का समय माना सुबह 8.30am से 03.15pm है तो किसी का नजरिया है कि अरे क्या फर्क पड़ता है, 5-6 मिनट हो गए?या 5-6 मिनट पहले ही संस्था से निकल घर जाने की सोंचने लगे।या इससे ज्यादा भी समय के लिए ऐसा करने लगे। अब वे कभी क्या समय प्रबन्धन में बेहतर हो सकते हैं? वहीं दूसरी ओर कोई अन्य इस सोंच में रहता है कि हम समय से पहले पहुंचे, समय से पहले से संस्था से न जाएं या फिर आज पूरा कार्य निपटा कर ही बाहर से निकलें,इन दोनों तरह के व्यक्तिर्यों में धरती आसमान का फर्क होगा लेकिन देखने को समाज व संस्थाओं में कुछ और मिलता है।हमने कुछ लोग देखे हैं कि उनकी संस्थाओं में उनकी कोई आस्था नहीं नहीं होती, संस्था में और क्या बेहतर हो, इसके प्रति इनमें कोई आस्था व नजरिया नहीं होता,24घण्टे अपने घर, अपनी निजी भौतिक व्यवस्थाओं में रहते हैं, यहां तक कि अपने कार्य क्षेत्र में या संस्था के अंदर संस्था में जो खास होते हैं, उनके साथ भी सिर्फ उन निजी भौतिक व्यवस्थाओं की चर्चा में रहते हैं।



इसी तरह हमें देखा है, कोई बच्चा को किसी विषय में पहला पाठ ही तैयार नहीं है,अब उसे दूसरा तीसरा.... यहाँ तक कि सत्र भर में उसे पूरा पाठ्यक्रम परोस दिया जाता है।हमारे नजर में यह भारतीय शिक्षा जगत की खामी है।हमारी नजर में बच्चों का विभाजन वर्तमान क्लास स्तर के आधार पर न होकर सेमिस्टर के आधार पर होना चाहिए।जैसे कि विश्व के अनेक संस्थाओं में ऐसा होता है कि जब तक बच्चा पहले सेमेस्टर की जानकारी एकत्र नहीं कर लेता उसे आगे नहीं बढ़ाया जाता।उसे क्लास स्तर पर आगे नहीं बढ़ाया जाता वरन सेमेस्टर व विषय के आधार पर आगे बढ़ाया जाता है।एक ही बच्चा गणित आदि एक ही सत्र में या अगले सत्र में भी पिछला सेमेस्टर का ही पढ़ रहा होता है अन्य विषय में आगे के सेमेस्टर का।भारत में भी ऐसा होना चाहिए।बच्चे को क्लास के आधार पर नहीं वरन विषय व विषय के सेमेस्टर के आधार पर आगे बढ़ाया जाए। खैर, यहाँ तो हम नजरिया व आस्था की बात कर रहे थे। हमने देखा है कि हम या सामने वाला जिस स्तर के हैं, उस स्तर पर कार्य हो ही नहीं रहा होता है।ट्यूशन।में..!? शिक्षा विद्यार्थी केंद्रित होनी चाहिए। ऐसे में हम विद्यालयों में पाठ्यक्रम के आधार पर बच्चों का विद्यार्थीकरण व कक्षाकरण विकार युक्त मानते ही हैं,विद्यालयों में हमारी मजबूरी है।सरकार से जो पाठ्यक्रम तय है वह हमें विद्यार्थियों के सामने परोसना ही है, क्यों न विद्यार्थी उस पाठ्यक्रम के लिए उपयोगी हो या न हो लेकिन होम ट्यूशन में में तो काफी गड़बड़ है।


लोग कहते मिल जाते हैं;अरे!इससे क्या फायदा?ऐसा जो कहते हैं, उनसे हमारा कहना होता है कि बस!खा लो,पी लो।कपड़े पहन लो।अपने शरीर की परेशानियों के लिए रोते रहो, बस!यही है जीवन? जीवन में अपनी अंतर प्रतिभाओं के माध्यम से अपने अनुकूल संस्थाओं या मंच के सहयोग से सक्रिय रहो। पाठ्य सहगामी क्रियाओं को जीवन में महत्व देकर जीवन को सुंदर बनाते हैं। साहित्यसंगीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः । तृणं न खादन्नपि जीवमानस्तद्भागधेयं परमं पशूनाम् ॥

अन्वय : साहित्य-संगीत-कला-विहीनः पुच्छ-विषाण-हीनः साक्षात् पशुः तृणम् न खादन् अपि जीवमानः, तद् पशूनाम् परमम् भाग-धेयं ।

अर्थ – जो मनुष्य साहित्य, संगीत, कला, से वंचित होता है वह बिना पूंछ तथा बिना सींगों वाले साक्षात् पशु के समान है । वह बिना घास खाए जीवित रहता है यह पशुओं के लिए निःसंदेह सौभाग्य की बात है ।



गीता के 18 अध्याय से स्पष्ट है कि आस्था व नजरिया जीवन में काम आता है।मनोविज्ञान कहता है-हमारे अचेतन मन में क्या चल रहा है?वह इस तन के नष्ट होने के वाद भी हमारा सूक्ष्म शरीर को मजबूरन ढोहना पड़ता है। किशोरावस्था, जवानी की हमारी आदतें, दिनचर्या हमारे नजरिया व आस्था ,नियति के निर्माण में काफी सहायक होती हैं।




आदमी की असलियत बुढ़ापा आने पर दिखती है कि वास्तव में उसने क्या कमाया अपने जीवन में? 


हमारे जीवन में दिनचर्या और आदतों का प्रभाव मरते दम तक रहता है संतों की माने तो इस हाड़ मास शरीर के मरने के बाद भी उससे छुटकारा नहीं मिलता हमने जीवन में क्या किया है इसका असर स्पष्ट रूप से बुढ़ापे में लिखता है।



40-50 के बाद स्पष्ट होता है कि हमने जीवन में क्या कमाया हमने जीवन में क्या ग्रहण किया? अनेक लोगों को देखा गया है कि इससे पूर्व अपने इंद्रियों,दिमाग ,बाहु बल, धन बल, पद बल आदि के माध्यम न जाने क्या-क्या समाज में प्रदर्शन करते रहे हैं। 




किशोरावस्था तूफानी अवस्था होती है, इसके बाद 25 साल तक का जीवन भी भविष्य के लिए काफी  महत्वपूर्ण होता है।इस समय के खवाब, चिंतन, मनन, स्वप्न, नजरिया, आस्था आदि मरने के बाद भी छुटकारा नहीं छोड़ता। अनेक बुजुर्ग देखे गए हैं।जिनका शरीर, इंद्रियां, दिमाग कमजोर हो चुका होता है लेकिन कुछ आदतें, नजरिया, आस्था जो पहले जी होती है, उसका असर मन में खूब आ आकर परेशान करता है।बुढ़ापा पर हम उनसे छुटकारा चाहते हैं लेकिन छुटकारा नहीं मिलता।वह अचेतन मन की काफी गहराई तक प्रवेश कर चुका होता है।उसको भूलने के लिए न जाने क्या क्या प्रयत्न किए जाते हैं लेकिन उससे छुटकारा नहीं मिलता हां, वह कुछ समय के लिए दब अवश्य जाता है। एक बुजुर्ग थे, डॉक्टर ने उन्हें मना कर दिया कि मीठा खाना छोंड़ दो लेकिन उनको उसकी तलब लगी रहती। किशोरावस्था, युवावस्था में उन्होंने रसगुल्ला, छेना आदि खाने पर कंट्रोल नहीं क्या था।जब इच्छा होती थी, खा लेते थे लेकिन अब बुढ़ापा पर क्या करें? मन में काम भावना अब भी परेशान कर देती है लेकिन क्या करें?लोक मर्यादा आदि के कारण, शरीर व इंद्रियों की कमजोरी के बाबजूद मन नहीं मानता।



भारत में शिक्षा में जो बदलाव होना चाहिए था, वह अभी तक नहीं हुआ। मन प्रबन्धन के लिए शिक्षा, कुल व समाज का वातावरण कुछ भी नहीं परोसता। समाज में जो आध्यत्म, धर्मकांड आदि दिखते भी हैं, वे भी सिर्फ भौतिक प्रशिक्षण तक सीमित रह जाते हैं।धर्मस्थल आदि में भी जाते हैं तो वहां भी प्रार्थना भौतिक लालसाओं की पूर्ति के लिए होती है ,मोक्ष के लिए नहीं।

#अशोकबिन्दु