काहे का वसुधैव कुटुुंुंकम ,जगत का कल्याण हो... चीखना?! आचरण क्या है? ऋषि मुनि नबियों के बाद आचार्य महत्वपूर्ण है ,आचरण महत्वपूर्ण हैैै। इससे काम नहीं चलता कि जिंदगी भर चीखते रहो -- जगत का कल्याण हो ,जगत का कल्याण हो । जगत में क्या गैरमजहबी गैरजात के लोग नहीं रहते ?उनके प्रति भेदभावना रखना क्या उचित है ?जब वसुधैव कुटुंबकम ही है तो अपने परिवार तरह पूरे विश्व हो क्यों नहीं समझते ?जाति ,मजहब ,देश आदि की सीमाओं में क्यों बैठे हुए हो ? विश्व सरकार ,विश्व बंधुत्व की बात क्यों नहीं करते ?
गुरुवार, 29 अक्टूबर 2020
हमारी जिंदगी नैतिक शिक्षा की वह किताब है जिसमें मोहम्मद व ईसा भी हैं।कोई बताए कि बसुधैव कुटुम्बकम का मतलब::अशोक बिंदु
बुधवार, 28 अक्टूबर 2020
आत्मा आत्मियता प्रकाश 360अंश विस्तृत::अशोकबिन्दु
"अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता"-ये कहने वाले जन्मजात उच्चवाद, जन्मजात व्यवस्था, शिक्षक, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि ही कहते मिल जाते हैं।लेकिन इनके जीवन में कोई अधिकार नहीं कर्तव्य ही कर्तव्य होते हैं, जगत कल्याण इनका हेतु होता है।
हमारे लिए 'स्वार्थ' है-आत्मा के लिए, आत्मा के धर्म -आत्मियता के लिए जीना। जिसका प्रकाश 360 अंश हर ओर फैलता है।इसलिए हम हृदय पर ध्यान को महत्व देते हैं। कुंडलिनी जागरण व सात शरीर, विराट रूप,अनन्त यात्रा में रुचि रखने वाले जानते होंगे हृदय चक्र व आस पास के बिंदुओं का जीवन में क्या महत्व है।
साइंस भी इधर के सुप्रीम साइंस की ओर पहुंचना शुरू होगया।हर विषय का आधार दर्शन ही है। जगदीश चन्द्र बसु जंतुओं की भांति वनस्पतियों में भी सम्वेदना/आत्मियता की बात करते हैं। कोई वैज्ञानिक ये कहता है-हमें ईंट में भी रोशनी दिखाई देती है, तो आप उस पर हंस सकते हैं।हम तो कहेंगे कि आत्मसाक्षात्कार से जी जीवन व परम् आत्मा की ओर, अनन्त यात्रा की ओर की यात्रा शुरू होती है।
पौराणिक अनेक घटनाएं अनेक को बकवास लगतीं है।हमें भी बकवास लगती थीं लेकिन मेडिटेशन करते करते जब हम जितना गहराई पकड़ते हैं-सब छंटता जा रहा है।हनुमान का सूरज भी निगलना, विश्वामित्र का अन्य धरती, प्रकृति अवयवों के निर्माण की क्षमता प्राप्त करना, अपनी सोलह रानियों के साथ एक ही समय पर एक साथ पंहुचना आदि सहज मार्ग में विज्ञान के साथ अनुभव में है।
हमने देखा है जब हम पढ़ते थे तो कुछ टीचर वृत्त में विद्यार्थियों को बैठालते थे और स्वयं बीच में बैठ जाते थे।कुछ टीचर विद्यार्थियों को यू या सी आकार में बैठालते थे।अब भी कुछ उच्च स्तरीय व अंतरराष्ट्रीय विद्यालयों में क्लास c या u आकार में लगाए जाते हैं। इसके पीछे भी एक सनातन दर्शन छिपा हुआ है।
और.... स्वार्थ?!हमारे स्वार्थ का सम्मान होना चाहिए।किसी आध्यात्मिक व्यक्ति का बोलना क्या होता है?एक अंतर्मुखी का बोलना क्या होता है?एक चिंतन मनन में रहने वाले का बोलना क्या होता है?सहजता...... ये सहजता में बोलना क्या है?
मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020
वेद मत सर्वत्र लेकिन अंतर व अनन्त प्रवृत्ति::अशोक
ये सब ठीक है लेकिन वर्तमान जो आस्तिक भी है वे भी भ्रम में है। जिनको देख कर अनेक को कहना पड़ा कि हम आपके ईश्वरों को नहीं मानते।ईश्वर को मानने के नाम पर भी क्या है? पास पड़ोस में लगभग सभी ईश्वर के नाम पर भ्रम में हैं।उन्हें इसका भी अहसास नहीं कि ब्रह्मा, विष्णु व महेश से ऊपर भी कोई है?उन्हें ये भी नहीं पता कि अपने अंदर की आत्मा के माध्यम से ही हम परम्आत्मा की ओर जा सकते हैं?और फिर एक बात ये भी कि जो आस्तिक है वे अपने जीवन में चाहते क्या हैं?एक आस्तिक होने के नाते उनकी चाहते नहीं दिखती। इस क्षेत्र में भी अनेक शब्द प्रचलित कर दिए गए हैं;योग,भक्ति, आस्तिक, यथार्थ आदि लेकिन सबकी जड़ एक ही है-अनन्त यात्रा व प्रकृति अभियान(यज्ञ)।यथार्थ ये है कि जो भी दिख रहा है, वह प्रकृति है।उस बीच वह भी जो निरन्तर है, सनातन है, स्वतः है, अनन्त है।दूसरा बनाबटी, कृत्रिम आदि।जो के तीन स्तर हैं-स्थूल, सूक्ष्म व कारण।वह नजर पैदा हो जाना ही योग/आल/अल/all/आदि है जब हमें अनेकता में एकता, विविधता में एकता, अनेक में एक, वसुधैव कुटुम्बकम, सागर में कुम्भ कुम्भ में सागर....आदि दिखाने लगे।हमारी नजर में आर्य है वह व्यक्ति सभी प्राणियों में एक ईश्वर की रोशनी देखे और सिर्फ आत्मरक्षा के लिए हिंसा ऊपरी मन से करे। वेद?वेद सिर्फ पुस्तक ही नहीं है, एक वह दशा भी है जो प्रकृति, ब्रह्मांड, जीव जंतुओं आदि पर सार्वभौमिक नजर दे जो कि स्वतः वेद स्वरूप जो जाएगा क्यों न उसे वेद का कोई श्लोक याद न हो।हर शब्द, हर वाक्य, हर श्लोक, हर आयत, हर पुस्तक के पीछे भी स्थूल, सूक्ष्म व कारण स्थितियां छिपी हैं।हमने कुछ सन्त देखे हैं जो जमाने के ग्रन्थ नहीं पढ़े लेकिन वह भावना से ,नजरिया से,व्याख्या से वैदिकता व सनातन में ही है। कुछ शोध कह रहे हैं कि जहाँ जमाने के ग्रन्थ, धर्मस्थल,धर्म नहीं पहुंचे वहाँ भी कुछ लोग जिस भाव, विचार, आस्था, नजरिया आदि में जीते थे वह सनातन, वैदिकता, मानवता आदि के समकक्ष ही थी।
अंतर जगत में अब भी सर्वव्याप्त मत है-वेद मत, जहां से सनातन की शुरुआत होती है लेकिन 98.8 प्रतिशत अभी इससे नीचे के मत/स्तर/क्लास में ही हैं। चेतना के अनन्त बिंदु अनन्त स्तर हैं।आत्मा अनन्त मुखी है।
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सोमवार, 26 अक्टूबर 2020
धर्म पथ बनाम अधर्म पथ::अशोकबिन्दु
धर्म पथ बनाम अधर्म पथ!!
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आप लोगों के धर्म /मजहब /जाति /आस्था /श्रद्धा आदि हमारी समझ में नहीं आते ?
मार्टिन लूथर की तरह हम पढ़े लिखे हैं !
हमने जो जाना है जो जान रहे हैं वह महत्वपूर्ण है !
आत्म प्रबंधन व समाज प्रबंधन ग्रंथों महापुरुषों का हेतु रहा है ।
जिस की समस्याओं का हल मानवता व अध्यात्म से ही संभव है। मनुष्य निर्मित प्रबंधन से भी बढ़कर है प्राकृतिक व सार्वभौमिक प्रबंधन। हाड़ मास शरीर, दिल दिमाग आदि का प्रबंधन ही हमारा धर्म है ।जो आवश्यकता है इच्छा नहीं।
मार्टिन लूथर ने कहा था - "मैं शिक्षित हूं हमें तुम्हारी बातों से कोई मतलब नहीं हम स्वयं पढ़ सकते हैं ग्रंथों में क्या लिखा है? हम स्वयं महसूस कर सकते हैं ईश्वर को विभिन्न क्रियाओं के माध्यम से। हमें दलालों की जरूरत नहीं है।"
धर्म के पथ पर अपना कोई नहीं होता ।अधर्म के पथ पर अपना कोई नहीं होता ।
जो पथ पर हमारे साथ है वही अपना है और न ही कोई अपना दुश्मन होता है। हम ही स्वयं अपने दुश्मन होते हैं और अपने मित्र होते हैं ।
हमें किन विचारों किन भावनाओं किन नियमों के आधार पर चलना है ?हमें ये स्वयं तय करना है ।लोग क्या कहते हैं -हमें इस से मतलब नहीं ।
हमारा चरित्र है जो , वह सिर्फ हमारे पास है उसे और कोई नहीं जान सकता ।समाज की नजर में हम चरित्र नहीं खड़ा कर सकते ।समाज में उन लोगों की नजर में जो जाति मजहब ,लोभ लालच, झूठ ,अज्ञानता, अंधविश्वास ,मनमानी आदि के आधार पर अपना जीवन जी रहे हैं ।हमें अपना चरित्र अपनी क्षमता ,अपनी प्रतिभा, अपने अंदर की दिव्य शक्तियों के आधार पर खड़ा करना है । हमारा चरित्र है -महापुरुषों के संदेशों से प्रेरणा लेकर चलने की कोशिश करना।हमारा चरित्र है मानवता के संदेशों को स्वीकार कर आगे बढ़ने की कोशिश करना। सारी कायनात का हम हिस्सा हैं ।
हम हाड़ मांस शरीर हैं। हम आत्मा हैं। हम बुद्धि हैं। हम दिल हैं ।हम जो स्वयं अपनी आवश्यकताएं रखता है जो स्वयं अपना एक प्रबंधन रखता है उसको जाति मजहब से मतलब नहीं उसे देश विदेश से मतलब नहीं ।उसे उन नियमों से मतलब है जिनसे वह जुड़ा है ।जो प्रकृति अभियान का हिस्सा है। जो ईश्वरी अभियान का हिस्सा है। जो हमें अनंत - शाश्वत से जोड़ता है। हमें आपके धर्मों से कोई मतलब नहीं। हमारे अंदर वह है जो निरंतर है। हमरा वही धर्म है।
हिन्दुओ की मनुस्मृति कहती है-
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचं इन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् । ।
पहला लक्षण – सदा धैर्य रखना, दूसरा – (क्षमा) जो कि निन्दा – स्तुति मान – अपमान, हानि – लाभ आदि दुःखों में भी सहनशील रहना; तीसरा – (दम) मन को सदा धर्म में प्रवृत्त कर अधर्म से रोक देना अर्थात् अधर्म करने की इच्छा भी न उठे, चैथा – चोरीत्याग अर्थात् बिना आज्ञा वा छल – कपट, विश्वास – घात वा किसी व्यवहार तथा वेदविरूद्ध उपदेश से पर – पदार्थ का ग्रहण करना, चोरी और इसको छोड देना साहुकारी कहाती है, पांचवां – राग – द्वेष पक्षपात छोड़ के भीतर और जल, मृत्तिका, मार्जन आदि से बाहर की पवित्रता रखनी, छठा – अधर्माचरणों से रोक के इन्द्रियों को धर्म ही में सदा चलाना, सातवां – मादकद्रव्य बुद्धिनाशक अन्य पदार्थ, दुष्टों का संग, आलस्य, प्रमाद आदि को छोड़ के श्रेष्ठ पदार्थों का सेवन, सत्पुरूषों का संग, योगाभ्यास से बुद्धि बढाना; आठवां – (विद्या) पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त यथार्थ ज्ञान और उनसे यथायोग्य उपकार लेना; सत्य जैसा आत्मा में वैसा मन में, जैसा वाणी में वैसा कर्म में वर्तना इससे विपरीत अविद्या है, नववां – (सत्य) जो पदार्थ जैसा हो उसको वैसा ही समझना, वैसा ही बोलना, वैसा ही करना भी; तथा दशवां – (अक्रोध) क्रोधादि दोषों को छोड़ के शान्त्यादि गुणों का ग्रहण करना धर्म का लक्षण है ।
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचं इन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् । ।
हम तो इतना ही जानते हैं कि दिल, दिमाग, शरीर की कोई जाति, कोई मजहब नहीं।उसका एक सिस्टम है,उसकी आवश्यकताएं हैं।उसके प्रति कर्तव्य हैं। चारो ओर सामने प्रकृति है।सारी कायनात है।प्रबन्धन - कुप्रबन्धन है। हमारे लिए दुनिया में आचरण से दो ही तरह के लोग हैं-सुर व असुर।हमें जीवन को समझना है।मृत्यु से पूर्व जीवन(शाश्वत) से जुड़ना है। जहां जाति, मजहब आदि मायने नहीं रखते।हमारे पथ पर हमारे साथ कौन है, ये महत्वपूर्ण है।
हम अभ्यासी/शिष्य/सिक्ख हैं। हमें अभ्यास ही शिष्यत्व ही निरन्तर बनाए रख सकता है।हमारा विकास विकास नहीं है।विकासशील है।सनातन निरन्तर है...अनन्त है....सागर में कुम्भ कुम्भ में सागर.....
#अशोकबिन्दु
गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020
कपाल क्रिया स्थूल से सूक्ष्म की ओर
कपाल क्रिया सूक्ष्म से सूक्ष्म की ओर🌹🌹 प्रत्येक व्यक्ति उस इंद्रिय से मरता है, जिस इंद्रिय के पास जीया। 🙏🙏
यह जानकर तुम हैरान होओगे कि प्रत्येक व्यक्ति अलग इंद्रिय से मरता है। किसी की मौत आंख से होती है, तो आंख खुली रह जाती है—हंस आंख से उड़ा। किसी की मृत्यु कान से होती है। किसी की मृत्यु मुंह से होती है, तो मुंह खुला रह जाता है। अधिक लोगों की मृत्यु जननेंद्रिय से होती है, क्योंकि अधिक लोग जीवन में जननेंद्रिय के आसपास ही भटकते रहते हैं, उसके ऊपर नहीं जा पाते। तुम्हारी जिंदगी जिस इंद्रिय के पास जीयी गई है, उसी इंद्रिय से मौत होगी। औपचारिक रूप से हम मरघट ले जाते हैं किसी को तो उसकी कपाल—क्रिया करते हैं, उसका सिर तोड़ते हैं। वह सिर्फ प्रतीक है। समाधिस्थ व्यक्ति की मृत्यु उस तरह होती है। समाधिस्थ व्यक्ति की मृत्यु सहस्रार से होती है।
जननेंद्रिय सबसे नीचा द्वार है। जैसे कोई अपने घर की नाली में से प्रवेश करके बाहर निकले। सहस्रार, जो तुम्हारे मस्तिष्क में है द्वार, वह श्रेष्ठतम द्वार है। जननेंद्रिय पृथ्वी से जोड़ती है, सहस्रार आकाश से। जननेंद्रिय देह से जोड़ती है, सहस्रार आत्मा से। जो लोग समाधिस्थ हो गए हैं, जिन्होंने ध्यान को अनुभव किया है, जो बुद्धत्व को उपलब्ध हुए हैं, उनकी मृत्यु सहस्रार से होती है।
उस प्रतीक में हम अभी भी कपाल—क्रिया करते हैं। मरघट ले जाते हैं, बाप मर जाता है, तो बेटा लकड़ी मारकर सिर तोड़ देता है। मरे—मराए का सिर तोड़ रहे हो! प्राण तो निकल ही चुके, अब काहे के लिए दरवाजा खोल रहे हो? अब निकलने को वहां कोई है ही नहीं। मगर प्रतीक, औपचारिक, आशा कर रहा है बेटा कि बाप सहस्रार से मरे; मगर बाप तो मर ही चुका है। यह दरवाजा मरने के बाद नहीं खोला जाता, यह दरवाजा जिंदगी में खोलना पड़ता है। इसी दरवाजे की तलाश में सारे योग, तंत्र की विद्याओं का जन्म हुआ। इसी दरवाजे को खोलने की कुंजियां हैं योग में, तंत्र में। इसी दरवाजे को जिसने खोल लिया, वह परमात्मा को जानकर मरता है। उसकी मृत्यु समाधि हो जाती है। इसलिए हम साधारण आदमी की कब्र को कब्र कहते हैं, फकीर की कब्र को समाधि कहते हैं—समाधिस्थ होकर जो मरा है।
प्रत्येक व्यक्ति उस इंद्रिय से मरता है, जिस इंद्रिय के पास जीया। जो लोग रूप के दीवाने हैं, वे आंख से मरेंगे; इसलिए चित्रकार, मूर्तिकार आंख से मरते हैं। उनकी आंख खुली रह जाती है। जिंदगी—भर उन्होंने रूप और रंग में ही अपने को तलाशा, अपनी खोज की। संगीतज्ञ कान से मरते हैं। उनका जीवन कान के पास ही था। उनकी सारी संवेदनशीलता वहीं संगृहीत हो गई थी। मृत्यु देखकर कहा जा सकता है—आदमी का पूरा जीवन कैसा बीता। अगर तुम्हें मृत्यु को पढ़ने का ज्ञान हो, तो मृत्यु पूरी जिंदगी के बाबत खबर दे जाती है कि आदमी कैसे जीया; क्योंकि मृत्यु सूचक है, सारी जिंदगी का सार—निचोड़ है—आदमी कहां जीया।
🙏🏻आपका दिन उन्नति कारक हो🙏🏻
# अज्ञात लेखक
गुरुवार, 10 सितंबर 2020
स्वच्छता ही ईश्वर है::महात्मा गांधी
जहां सोच है वहां शौंचालय है!
सन्तों ने कहा है-न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।
महात्मा गांधी से हमें न बैर है न दोस्ती। हमारा धर्म कहता है, सबका सम्मान करो।जब सागर में कुम्भ कुम्भ में सागर।
भारतीय स्वच्छता अभियान को गांधी जोड़ने के पीछे जो मंशा है, वहां तक लोग नहीं पहुंचते हैं।
इस पर भी नहीं पहुंचते हैं-जहां सोच है वहां शौचालय है।
हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं।हमने इसे महसूस किया है।हम इसे जिए हैं। स्वच्छता ही ईश्वर है, इसे गांधी को क्यों कहना पड़ा?
जब हम सहज हुए हैं, डेढ़ साल के बच्चे की तरह हुए हैं, हमने स्वयं अपने अंदर अनेक जीव जंतुओं के अंदर प्रकाश या चेतना या जगदीश चन्द्र बसु की सर्वव्याप्त सम्वेदना/आत्मियता/आत्मात्व को देखा है।
स्वच्छता का हर व्यक्ति, हर पन्थ में महत्व रहा है।लेकिन हम देखते हैं, ये स्वच्छता सिर्फ स्थूल तक ही सीमित है। विचारात्मक, भावात्मक, मनस आदि स्तर पर स्वच्छता को महत्व नहीं दिया जाता है। हम स्थूल,सूक्ष्म व कारण स्तर पर हम व हमारा सिस्टम स्वच्छता पर ध्यान नहीं दे रहा है।
स्वच्छता के साथ आत्मा का क्या सम्बन्ध है?स्वच्छता का परम् आत्मा के साथ क्या सम्बन्ध है?
हमारा अपने व अन्य हाड़ मास शरीरों के साथ क्या भाव, विचार व समझ होनी चाहिए?
हमारा प्रकृति के अन्य वस्तुओं के साथ क्या भाव, विचार व समझ होना चाहिए?
यही भाव, विचार व समझ ही हमारी स्वच्छता या अस्वच्छता को व्यक्त करता है।
यहां पर हमारे अपने व अन्य हाड़ मास शरीरों, प्रकृति की अन्य वस्तुओं के कर्तव्य महत्वपूर्ण करता है न कि उम्मीदें/इच्छाएं/भोग।
हमारी सहज मार्ग प्रार्थना में पंक्तियां आती हैं-
"हम अपनी इच्छाओं के गुलाम हैं
जो हमारी उन्नति में बाधक है।"
ये सहज मार्ग प्रार्थना क्या है?
"हे नाथ!
तू ही मनुष्य जीवन का वास्तविक ध्येय है।
हम अपनी इच्छाओं के गुलाम हैं
जो हमारी उन्नति में बाधक है।
तू ही एक मात्र ईश्वर एवं शक्ति है
जो हमे उस लक्ष्य तक ले चल सकता है। "
हम आत्मा व परम् आत्मा से प्रकाशित कब हो सकते हैं?
पवित्रता से ,स्वच्छता से।
ये पवित्रता व स्वच्छता अनेक स्तर पर है। अनेक तरह से है।
रविवार, 6 सितंबर 2020
विज्ञान और आध्यात्मिकता::अशोकबिन्दु
पृष्ठ 139,
विज्ञान और आध्यात्मिकता,
पुस्तक-वे, हुक्का और मैं
बाबूजी महाराज!
" आज आधुनिक विश्व में या कहें कि विश्व मंच पर विज्ञान और आध्यात्मिकता पर बहस होती रहती है। क्या विज्ञान ऐसी कोई चीज है। मुझे ठीक से पता नहीं पर शायद शताब्दियों से पुनर्जागरण के समय से विज्ञान पूरी तरह से स्वीकृत हो चुका है। आरंभ में अंधविश्वास माना जाता था। उन दिनों मेरे विचार में विज्ञान और अंधविश्वास दोनों थे। क्या ये सच है कि बारूद से ...!?हां, परीक्षण द्वारा सिद्ध है ।जिस चीज का भी आप परीक्षण कर सकते हैं ।वह प्रमाणित हो जाती थी ।और विज्ञान की मांग यह है कि उसे सिद्ध किया जाए ।एक बार नहीं बार-बार ।चाहे जो भी उस परीक्षण को करें ।विज्ञान की समस्या यही है। मैं ईश्वर को अनुभव करता हूं ।मगर मुझे वह दिखाई नहीं देता । अरे,वह कुर्सी पर बैठे हैं लेकिन मुझे दिखाई नहीं देते ।जबकि विज्ञान में परीक्षा और परिणाम किसी के भी द्वारा और हर एक के द्वारा बार-बार दोहराने लायक होने चाहिए । "
पुस्तक'वे, हुक्का और मैं' के इस अध्याय -'विज्ञान और आध्यत्मिकता' की कुछ पंक्तियां हम ये लिख रहे है। ये पुस्तक हम अनेक केंद्रों, आश्रम व यहाँ तक कान्हा में भी तलाश कर चुके हैं लेकिन प्राप्त हुई है।जब हमें ऐसे पढ़ना होता है तो नगर में ही एक अभ्यासी श्री ब्रह्माधार मिश्रा के यहां से पढ़ने के लिए ले आते हैं। हां, तो-
" और विज्ञान का दावा है कि वैज्ञानिक सब कुछ जानते हैं ।दार्शनिक अपने अंदाज में दावा करते हैं कि वह बहुत कुछ जानते हैं ।रहस्यवादी कभी-कभी भिखारी जैसे प्रतीत होते हैं ।तभी वे मौजूद होते हैं। कभी गायक ।और अपने बारे में बहुत कम बताते हैं। उनमें से बहुत से संकोची और गंभीर स्वभाव के होते हैं। लेकिन उनमें असाधारण शक्तियां होती हैं । इससे सवाल उठता है कि क्या ज्ञान और शक्ति दो भिन्न चीजें हैं या जैसा हम समझते हैं या जैसा कि पाश्चात्य विज्ञान कहता है ।विज्ञान से ज्ञान प्राप्त होता है । यदि यह सच है तो फिर रहस्यवाद न होता न संत होते न ही ऋषि। तो फिर वही पुराना सवाल आता है - पहले अंडा हुआ या मुर्गी ? पहले बीज हुआ या वृक्ष? किसी ने मजाक में बाबू जी से पूछा इस बारे में आपका क्या ख्याल है पहले बीज निर्मित हुआ था या पहले वृक्ष बनाया गया था पहले बाबू जी ने कहा ईश्वर मूर्ख नहीं है कि अपने साथ में लेकर चले सैकड़ों हजारों पेड़ । और फिर जहां चाहा वहां लगा दिया। जबकि वह अत्यंत छोटे-छोटे बीज बना सकता था । और वह अपनी जेब में लाखों बीज लेकर चल सकता था । अतः जब हम ईश्वर को बुद्धिमान मानते हैं जैसा कि पश्चिम के लोग कहते हैं, ईसाई धर्म कहता है। हमें मान लेना चाहिए था कि उन्हें इस सवाल का जवाब मालूम होगा। वास्तव में यह बात सच है । स्पष्ट है स्वत: ही प्रमाणित है कि ऐसे सवाल कभी पूछो ही नहीं जाने चाहिए थे। पर उन्होंने पूछा और मेरे बाबूजी महाराज ने इसका जवाब दिया ईश्वर मूर्ख नहीं है कि वह पेड़ बनाए और उन्हें साथ लिए लिए फिरता रहे। यह तो फ्रांसीसी चित्र कथा एस्ट्रिक्स की तरह है। जिसमें वह पीठ पर भारी भारी पत्थर लेकर चलता है। जो तय करता है कि वह गाल अर्थात फ्रांस देश का प्राचीन नाम को ढूंढ निकालेगा। और गाल को ढूंढ निकालता है । किस किस्म की समझदारी है ।उन्हें पता होता है कि वे क्या खोजने जा रहे हैं जो निहायत बेवकूफी की बात है ।क्योंकि हम किसी चीज के बारे में उसकी खोज ही जाने के बाद ही जानते हैं। फिर एस्ट्रिक्स की खूब बिक्री होती है। कुछ लोग इसे कला मानते हैं ।कुछ ऐसे साहित्य मानते हैं ।इत्यादि इत्यादि। माइटी माउस , माइटी मैन इस सब चित्र कथाएं.... किसी न किसी प्रकार मानव को अपने पर्यावरण का अधिकार प्राप्त करने की इच्छा दर्शाती हैं। देखिए जब एस्ट्रिक्स के उस आदमी की बात करते हैं जो अपनी पीठ पर क्या कहते हैं उसे ?ओबेलिस्क? हां - 'मेंहिर' - हम मान लेते हैं कि कुछ ऐसे लोग रहे होंगे जो अपनी पीठ पर 200 टन का बोझ लेकर चल सकते हो तो महान बनने की शक्तिशाली और ताकतवर बनने की मानवी आकांक्षा है। हमारे पुराणों की, शास्त्रों की सारी कहानियां, जो गधे के जबड़े की हड्डी की कहानी या वह गुलेल जिससे डेविड ने गोलियथ को मार डाला। इन सभी में या तो मानवी शक्ति मानवी कल्याण मानवीय श्रेष्ठता प्रदर्शित होती है। या फिर वे दिखाती हैं कि वह एक नरम स्वभाव वाला आदमी है दब्बू किस्म का आदमी है छोटा सा साधारण आदमी है जिसमें स्वयं परमात्मा की शक्ति मौजूद है जैसी डेबिट मे थी और जब गोलियथ आया उसने उसके ललाट पर इस तरह चोट की और गोलियां जैसा विशालकाय राक्षस मर गया । यही बात गधों के जबड़े की हड्डी की या फिर शेर की कहानी में है अतः या तो हमें शारीरिक श्रेष्ठता है या फिर मनुष्य में ईश्वर का वास होने के कारण उसे श्रेष्ठता प्रदान की गई है । उसे ईश्वरी सामर्थ्य का वरदान दिया गया है । बाइबिल में बे बार-बार कहते हैं-😢 हे इजराइल के ईश्वर ...!
विज्ञान और धर्म के अनुसार हम इनमें से कोई एक चुन सकते हैं या तो आप धार्मिक हो सकते हैं । पर इससे भी आपको ऐसा व्यक्ति होना पड़ेगा जिसने अपने को भुला दिया हो जो आप अपने लिए नहीं जीता जिसने स्वयं को सर्वशक्तिमान परमात्मा के प्रति समर्पित कर दिया हो और सब परमात्मा एक प्रकार से उस में प्रवेश कर जाता है । वह आवेशित हो जाता है किसी दुष्ट आत्मा से नहीं बल्कि स्वयं परमात्मा से । तब हम आध्यात्मिक व्यक्ति की सामर्थय देखते हैं। जो अपने समय के महानतम शासकों से भी विरुद्ध खड़े हुए चाहे वह हिरोद हो या फिर सीजर हो। यही बात हम अपनी हिंदू परंपरा हिंदू धर्म में भी देखते हैं नन्हा प्रहलाद और उसका पिता राक्षस सम्राट । एक और दो सामान्य मनुष्य राम और लक्ष्मण दूसरी ओर रावण एक राजा । अपनी पूरी ताकत के साथ जिसमें तपस्या से प्राप्त किए गए , ऐसे वरदान की शक्तियां भी शामिल थी जिन्हें उनकी तपस्या के फलस्वरूप प्रसन्न होकर भगवान ने स्वयं प्रकट होकर वरदान मांगने के लिए कहा और उन्होंने जो भी वरदान माला उसके लिए कह दिया - तथास्तु । लेकिन जब उन्होंने मागा तो वे भूल गए तो वे भूल कर गए। प्रहलाद के पिता हिरण्य कश्यप ने कहा , न मैं घर के के अंदर मरूं न बाहर ना जमीन पर न आसमान में न ठोस वस्तु से न तरल वस्तु से, न दिन में न रात में , न आदमी से और न ही जानवर से मारा जाऊं ," इत्यादि । और परमात्मा ने स्वयं नरसिंह रूप धारण कर यह संभव कर दिखाया । न आदमी न जानवर , उन्होंने उसे संध्या के समय मारा। जब न दिन था न रात । उन्होंने उसे देहरी पर मारा न । घर के अंदर न बाहर । उन्होंने उसे अपनी गोद में मारा न जमीन पर न आसमान में । अतः ईश्वर क्या कर सकता है ? हम सोच भी नहीं सकते । इसी प्रकार रावण ने भी कहा था- मैं न देवता से मारा जाऊं न असुर से, लेकिन नर और वानर जो इतनी मामूली और कमजोर थे कि उनके विषय में सोचना भी उसकी शान के खिलाफ था इसलिए मैं उसने उसे शामिल नहीं किया मैं नया वानर द्वारा ना मारा जाऊं और बे ही उसकी मृत्यु का कारण बने अतः यह परंपराएं रही हैं वह ताकतवर रावण वेदांती वेदों का ज्ञाता फिर भी ज्ञान उसके काम नहीं आया एक प्रकार से आप यहां ज्ञान और भक्ति साथ-साथ पाते हैं ज्ञान व्रत है उसे संपूर्ण ज्ञान था उसके पास भक्ति नहीं थी हालांकि उसके पास पृथ्वी की बड़ी से बड़ी शक्ति थी परंतु वह भी उसे अपने स्वयं के बिना से नहीं बचा सके दूसरी ओर हरियाणा कश्यप आप जो कुछ चाहा सकते हैं वे सारी शक्तियां उसके पास ही मगर जब उसके पुत्र ने कहा आपको नारायण से प्रार्थना करनी चाहिए उनकी शरण में जाइए तो उसने अपने पुत्र को अनेक बार मारने की चेष्टा की किंतु असफल ही रहा उसने उसे पहाड़ की चोटी से समुद्र में टिकवा दिया परमात्मा ने उसे अपने हाथों में आमलिया उसे महल के एक दुष्ट हाथों से कुछ अल्वा ने की कोशिश की गई अपनी सूंड उठाकर हाथी चिंघाड़ा और चला गया। तो,ऐसा विश्वास रक्षा करता है।"मेरा मालिक मेरी रक्षा करेगा"-क्या हममे वह विश्वास है? या की यह केवल एक मानसिक विचार भर है जो मौका आने पर अपना विश्वास सिद्ध करेगा लेकिन हम उसे मौका नहीं देना चाहते मैं एक व्यक्ति को जानता हूं जो यहां मद्रास में था जिसे दिल की कोई बीमारी हो गई थी और जिसने सेटिंग देना बंद कर दिया उसने बताया की उसके डॉक्टर ने कहा है तुम्हें दिल की बीमारी है तुम्हें सेटिंग नहीं देनी चाहिए तुम्हें ध्यान नहीं करना चाहिए और बाबू जी ने कहा देखो उसे पता है कि उसकी रक्षा करने के लिए मैं हूं मगर उसे विश्वास नहीं है मान लो मैदान के दौरान मर भी जाए तो इंसान के लिए क्या इससे बेहतर और कोई मृत्यु हो सकती है लोग मरने के लिए समाधि लगाते हैं ,और वह ध्यान करने से डरता है कहीं मर ना जाए जबकि यदि वह ध्यान के दौरान मरता तो सीधे लक्ष्य पर पहुंचता देखिए व्यक्ति के ऐसे डर भी होते हैं हमें विश्वास होना चाहिए हम मुंह से बोलते तो हैं कि हमें विश्वास है मजा हमारे दिल में जरा भी विश्वास नहीं होता हमारे पास ताकत है मगर हम इसे इस्तेमाल नहीं कर पाते क्योंकि हम डरते हैं इस सामने वाले के पास हमसे ज्यादा ताकत है जबकि ईश्वर के सामने तो कुछ भी ठहर नहीं सकता अतः हम सब एक प्रकार से'सी-सॉ' की दुनिया में रह रहे हैं, जहां पर ना यह सच है ना वह कभी कभी वह और हम एक प्रकार से विज्ञान और अध्यात्म के बीच उलझे हैं आज आधुनिक विश्व में या कहें की विश्व मंच पर विज्ञान और आध्यात्मिकता पर बहस होती रहती है क्या विज्ञान जैसी कोई चीज है मुझे ठीक से पता नहीं पर शायद शताब्दियों से पुनर्जागरण के समय से विज्ञान पूरी तरह से स्वीकृत हो चुका है आरंभ में अंधविश्वास माना जाता था उन दिनों मेरे विचार से विज्ञान और अंधविश्वास दोनों थे क्या यह सच है बारूद से हां परीक्षण द्वारा सिद्ध है जिस चीज का भी आप परीक्षा कर सकते हैं वह प्रमाणित हो जाती थी और विज्ञान की मांग यह है कि उसे सिद्ध किया जाए एक बार नहीं बार-बार चाहे जो भी उस परीक्षण को करें विज्ञान की समस्या यही है मैं ईश्वर को अनुभव करता हूं मगर मुझे वह दिखाई नहीं देता अरे देवा कुर्सी पर बैठे हैं लेकिन मुझे दिखाई नहीं देते जबकि विज्ञान में परीक्षण और परिणाम किसी के द्वारा भी और हर एक के द्वारा बार-बार दोहराने लायक होने चाहिए तो इस तरह की लड़ाई चलती आ रही है लेकिन अब ऐसे कहीं अधिक प्रमाण सुलभ हैं तथाकथित वैज्ञानिकों के द्वारा भी काफी हद तक स्वीकार किए जाते हैं और फिल्म -"व्हाट द ब्लिप डू वी नो?' जिसमें क्वांटम विश्व, क्वांटम भौतिक विज्ञान की चर्चा की गयी है, उन्हीं सबके बारे में है। उसमें कुछ बहुत सुंदर घटनाएं हैं; कैसे कोई चीज दो स्थानों पर या कई स्थानों पर हो सकती है आप देखते हैं एक लड़का फर्श पर एक बड़ी गेम को टप्पा मार्कर उछलता है और जब यह सब देखने वाली महिला ने निघा घुमाई तो देखा चारों ओर असंख्य में उछल रही हैं और बे कहते हैं की क्वांटम जगत है और वह क्वांटम वास्तविकता है यह कहीं भी हो सकता है हर जगह हो सकता है लेकिन जब हम गौर करते हैं हम गौर करने से उस वस्तु को एक जगह पर स्थिर कर देते हैं अब जैसे कि आज सुबह मैं अपने कुछ साथियों से बात कर रहा था इस विषय पर मैंने एक बात गौर की क्वांटम के क्षेत्र में चीजें हर जगह मौजूद मालूम पड़ती है हर जगह हो सकती हैं मगर ध्यान से एक जगह पर स्थिर कर देता है मुझे एक विचार आया ईश्वर भी हर जगह है सभी जगह है जब मैं उस पर गौर करता हूं तो मैं उसे वहीं पर स्थिर कर देता हूं जहां मैं उनकी मौजूदगी चाहता हूं लेकिन तब क्वांटम क्षेत्र भंग हो जाता है और दिखाई देने वाली वास्तविकता का क्षेत्र बन जाता है और सब कुछ मिलकर वही बन जाता है जो हम देखना चाहते हैं जबकि ईश्वर तो हर समय हर जगह मौजूद है बात सिर्फ इतनी है कि यदि मुझ में विश्वास हो और उसे वहां स्थित करने की क्षमता हो तो मैं उसे वही देख सकता हूं वही देख सकता हूं जहां मैं देखना चाहता हूं।"






