सोमवार, 26 अप्रैल 2021
शनिवार, 24 अप्रैल 2021
श्री महावीर जयंती:: महाव्रत प्रकृति अभियान/यज्ञ से सम्बद्ध होने का आगाज::अशोकबिन्दु
जब वीर की बात चलती है।
हमारा ध्यान जैन पर जाता है,जिन पर जाता है।
वीर हमारी नजर में दो तरह के हैं-अंतर्मुखी व बहिर्मुखी।
महावीर का महाव्रत योग के अंगों में से पहले अंग है-सत्य, अहिँसा,अस्तेय, अपरिग्रह व ब्रह्मचर्य।
एक बार महावीर जैन अपने संघ के साथ एक गांव के बाहर देव स्थान पर आकर रुके। वहां वे साथ आठ दिन रहे और सद्चर्चा की।
वे रोज अपना भिक्षा पात्र लेकर गांव जाते और खाली ही भिक्षा पात्र लेकर वापस आ जाते।
गांव में कौतूहल होता, स्वामी को घर घर लोग भिक्षा देने के लिए तैयार लेकिन तब भी वे खाली पात्र लेकर गांव से वापस चले आते।
इस तरह अनेक दिन बीत गए।
लोगों ने एक दिन देखा कि इस बार पात्र खाली नहीं है। वास्तव में भिक्षा पात्र खाली न था।
लोगों ने पूछा।
दरअसल, महावीर गांव क्षेत्र में प्रवेश करते मन ही मन संकल्प लिए थे कि जिस घर के दरबाजे पर कोई स्त्री काले कपड़े पहले हमें भिक्षा देने लिए खड़ी होगी,तभी हम उससे भिक्षा ग्रहण करंगे।
हमारा विश्वास कहाँ पर टिका है?नब्बे प्रतिशत लोग भूत योनि की संभावनाओं में ही जीते हैं।
हम अपनी पूर्णता में जीते कब है ? हमसब के अन्दर दिव्यताओं की संभावना हैं, हम सब प्राकृतिक मूर्ति है।हममे प्राकृतिक प्राण प्रतिष्ठा है। हम उसको कब अवसर देते हैं?
संकल्प व अंतर शक्तियों की आजमाइश में हम कब रहते हैं?जड़ भरत व ऋषभदेव का महाव्रत है, संकल्प व अन्तरशक्तियों को अवसर देना।यह कहने से काम नहीं चलता कि हम आस्तिक हैं, हम सनातनी हैं।हम आजमाइश किसकी करते हैं ?यह महत्वपूर्ण है।
किसी ने कहा है योगी है मृत्यु।आचार्य है मृत्यु। विश्वास है ,आस्तिकता है-आत्मा या अंतर्चेतना, या अंतर व्याप्त स्वतः, निरन्तर पर विश्वास। जो जगत में मृत्यु से कम नहीं है।
चारो ओर अंधेरा ही अंधेरा है, जंगल है, प्रकृति है।अफसोस सब बनावटों, पूर्वाग्रहों में विश्वास करते हैं।आत्मा व आत्मा के गुणों, आत्मा के वातवरण को स्वीकार किया नहीं अर्थात आत्मियता, आत्म बल, आत्म प्रतिष्ठा, आत्म सम्मान, आत्म धर्म को जिया नहीं परम् आत्मा को क्या जिएगा? इसलिए कमलेश डी पटेल दाजी का कहना है कि तुम आस्तिक हो या नास्तिक ये महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है कि तुम।महसूस क्या क्या करते हो?तुम्हारी समझ व चेतना का स्तर क्या है?
हम कहते रहे हैं कि लोग बुद्ध व जैन को अनीश्वरवादी मानते है लेकिन हम नहीं। वैसे भी दुनिया उनके खिलाफ रही है जिनमें धर्म पैदा होने के लिए लालाइत रहाहै। दुनिया तो पाखण्ड।में।रही है।
#अशोकबिन्दु
सोमवार, 19 अप्रैल 2021
20 अप्रैल 2021/दुर्गाष्टमी !!एक स्त्री का शिष्य/सिक्ख होना::अशोकबिन्दु
संभवत 90% सृष्टि् का कारण का कश्यप ऋषि हैं । मानव समाज अनेक वर्ग,भेद आदि में फ़ंस गया। इसका कारण उनकी माताएं अलग अलग होना है । एक स्त्री का मानव सभ्यता में बड़ा योगदान रहा है ।शनिवार, 10 अप्रैल 2021
इंसानों के समाज में इंसान को कुचला जा रहा है ::अशोकबिन्दु
हम क्या हो रहे हैं?!
अच्छे दिन आ गए?किसके ?!
किसके अच्छे दिन?!
हो क्या रहा है?!
जातिवाद बढ़ रहा है..
सम्प्रदायिकता बढ़ रही है,
बेरोजगारी बढ़ रही है,
नशा व्यापार बढ़ रहा है,
सेक्स व्यापार बढ़ रहा है,
बाबा जी की सरकार है-
मंदिर बन रहा है?!
मोदी की सरकार है-
विदेश नीति बेहतर कर रहा है?!
सब, अच्छा हो रहा है?!
कोशिस है-
मत देखो आधा गिलास खाली है,
देखो-
आधा गिलास भरा है।
किसी के लिए हिन्दू खतरे में है,
किसी के लिए मुसलमान खतरे में है;
कुदरत से पूछो-
इंसानियत से पूछो-
आध्यत्म से पूछो-
कौन खतरे में है?
कुदरत में कोई समस्या नहीं,
समस्या स्वयं मानव समाज में है;
हजार वर्ष बाद-
बची खुची मानवता तुम पर थूकेंगी,
तुम्हारे द्वारा खड़ी की गई मूर्तियों -धर्म स्थलों पर,
बैठने को पक्षी भी न होंगे,
कुदरत तुम पर हंसेगी।
महाभारत बाद-
द्रोपदी, गांधारी, धृतराष्ट्र की आत्माएं-
अब भी रो रही हैं,
मगर
नये नये किरदार द्रोपदी, गांधारी, धृतराष्ट्र के सजे खड़े हैं,
विदुर पहले जैसा था आज भी बैसा है।
दुनिया का सबसे बड़ा भृष्टाचार है-शिक्षा,
संबसे बड़ी है समस्या-
आज का इंसान इंसान नहीं है,
इंसानों की भीड़ में-
इंसानियत ढूढ़ती पहचान है।
#अशोकबिन्दु
इंसान बनो इंसानियत स्वीकारो!
शनिवार, 3 अप्रैल 2021
अंगुलिमाल की गलियों में अहिंसा का अस्त्र::अशोकबिन्दु
चलो ठीक, सामने वाला अपराधी ही हम मान लेते हैं।
प्राणाहुति परंपरा और ऊर्जा शरीर ऊर्जा,चेतना कुम्भ ,ज्योतिर्लिगों के पीछे का रहस्य::अशोकबिन्दु
अपनी व जगत के प्रकृति की पूर्णता की समझ और एहसास ही वास्तव में ज्ञान है जो ही वास्तव में सनातन की और ले जाता है।
गुरुवार, 1 अप्रैल 2021
वेदांगों में ज्योतिष पर हम केंद्रित होते रहे हैं::अशोकबिन्दु
शिक्षा,कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरूक्त वेदांग हैं। हम आज की तारीख तक ज्योतिष को छठ वां अंग ही मानते हैं।ज्योति+ईष अर्थात ज्योति का संकेत। वेद हमारे लिए पुस्तक नहीं वरन दशा है।
- शिक्षा - इसमें वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है। स्वर एवं वर्ण आदि के उच्चारण-प्रकार की जहाँ शिक्षा दी जाती हो, उसे शिक्षा कहाजाता है। इसका मुख्य उद्येश्य वेदमन्त्रों के अविकल यथास्थिति विशुद्ध उच्चारण किये जाने का है। शिक्षा का उद्भव और विकास वैदिक मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण और उनके द्वारा उनकी रक्षा के उदेश्य से हुआ है।
- कल्प - वेदों के किस मन्त्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिये, इसका कथन किया गया है। इसकी तीन शाखायें हैं- श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र। कल्प वेद-प्रतिपादित कर्मों का भलीभाँति विचार प्रस्तुत करने वाला शास्त्र है। इसमें यज्ञ सम्बन्धी नियम दिये गये हैं।
- व्याकरण - इससे प्रकृति और प्रत्यय आदि के योग से शब्दों की सिद्धि और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध होता है। वेद-शास्त्रों का प्रयोजन जानने तथा शब्दों का यथार्थ ज्ञान हो सके अतः इसका अध्ययन आवश्यक होता है। इस सम्बन्ध में पाणिनीय व्याकरण ही वेदांग का प्रतिनिधित्व करता है। व्याकरण वेदों का मुख भी कहा जाता है।
- निरुक्त - वेदों में जिन शब्दों का प्रयोग जिन-जिन अर्थों में किया गया है, उनके उन-उन अर्थों का निश्चयात्मक रूप से उल्लेख निरूक्त में किया गया है। इसे वेद पुरुष का कान कहा गया है। निःशेषरूप से जो कथित हो, वह निरुक्त है। इसे वेद की आत्मा भी कहा गया है।
- ज्योतिष - इससे वैदिक यज्ञों और अनुष्ठानों का समय ज्ञात होता है। यहाँ ज्योतिष से मतलब `वेदांग ज्योतिष´ से है। यह वेद पूरुष का नेत्र माना जाता है। वेद यज्ञकर्म में प्रवृत होते हैं और यज्ञ काल के आश्रित होते है तथा जयोतिष शास्त्र से काल का ज्ञान होता है। अनेक वेदिक पहेलियों का भी ज्ञान बिना ज्योतिष के नहीं हो सकता।
- छन्द - वेदों में प्रयुक्त गायत्री, उष्णिक आदि छन्दों की रचना का ज्ञान छन्दशास्त्र से होता है। इसे वेद पुरुष का पैर कहा गया है। ये छन्द वेदों के आवरण है। छन्द नियताक्षर वाले होते हैं। इसका उदेश्य वैदिक मन्त्रों के समुचित पाठ की सुरक्षा भी है।






