मंगलवार, 29 सितंबर 2026

अकाल की सफेद आँखें?

सन 1877 ईस्वी…
दक्षिण भारत के एक घने जंगल के किनारे बसे छोटे-से गाँव में धरती फट चुकी थी। तालाबों की मिट्टी में लंबी दरारें थीं। पेड़ों पर पत्तियाँ कम और धूल अधिक दिखाई देती थी। हवा चलती तो हरियाली की सुगंध के स्थान पर सूखी मिट्टी उड़ती। जंगल के बीच एक वृद्ध बरगद के नीचे कुछ बुजुर्ग बैठे थे। उनमें सबसे वृद्ध व्यक्ति का नाम धरणीधर था। उसने अपने सामने फैली सूनी धरती को देखा और उसकी आँखों में आँसू आ गए। एक बालक ने पूछा— “बाबा, आप रो क्यों रहे हैं?” धरणीधर ने काँपती आवाज में कहा— “मैं केवल सूखी धरती देखकर नहीं रो रहा हूँ। मैं इसलिए रो रहा हूँ क्योंकि खेत सूखने से पहले मनुष्य की संवेदना सूख गई है।” “लेकिन वर्षा न होने में मनुष्य का क्या दोष?” बालक ने पूछा। बुजुर्ग ने उत्तर दिया— “सूखा प्रकृति ने दिया होगा, परंतु अकाल केवल प्रकृति नहीं बनाती। अकाल तब बनता है, जब खेत में अनाज कम हो जाए और बाजार में उसका मूल्य इतना बढ़ जाए कि गरीब उसे खरीद न सके। अकाल तब बनता है, जब गोदामों और व्यापारिक रास्तों पर अनाज चलता रहे, मगर भूखे मनुष्य के घर तक न पहुँचे।” उसी समय गाँव की ओर से एक स्त्री लड़खड़ाती हुई आई। उसकी गोद में एक अचेत बच्चा था। वह बोली— “बाबा! तीन दिन से इसे अन्न का एक दाना नहीं मिला।” पास खड़े साहूकार की बैलगाड़ी में अनाज की बोरियाँ लदी थीं। वे बोरियाँ गाँव के भूखे लोगों के लिए नहीं, दूर के बाजार में अधिक कीमत पर बेचने के लिए जा रही थीं। धरणीधर ने गाड़ी की ओर देखकर पूछा— “जब गाँव भूखा है, तब यह अनाज कहाँ जा रहा है?” साहूकार ने निर्लिप्त स्वर में उत्तर दिया— “जहाँ इसकी अच्छी कीमत मिलेगी। अनाज व्यापार की वस्तु है।” धरणीधर की आँखों से आँसू बह निकले। “नहीं,” वह बोला, “भूखे मनुष्य के सामने अनाज केवल व्यापार की वस्तु नहीं होता—वह जीवन होता है।” राहत की सड़क कुछ दिनों बाद अंग्रेज सरकार की ओर से अकाल-राहत कार्य आरम्भ हुआ। भूखे लोगों से सड़कें खुदवाई जाने लगीं। काम करने पर थोड़ी मजदूरी और सीमित मात्रा में भोजन मिलता था। गाँव का युवक रघुवीर अपनी दुर्बल माँ को सहारा देकर राहत-स्थल तक ले गया। अधिकारी ने कहा— “जो काम करेगा, उसी को भोजन मिलेगा।” रघुवीर ने निवेदन किया— “साहब, मेरी माँ इतनी कमजोर है कि खड़ी भी नहीं हो सकती। वह काम कैसे करेगी?” अधिकारी ने नियमों की पुस्तिका बंद करते हुए कहा— “व्यवस्था भावनाओं से नहीं, नियमों से चलती है।” रघुवीर ने उत्तर दिया— “लेकिन यदि नियम किसी भूखे व्यक्ति को भोजन देने से रोक दे, तो वह व्यवस्था नहीं—मृत्यु का लेखा बन जाता है।” किसी अधिकारी ने उसकी बात नहीं सुनी। रघुवीर दिनभर पत्थर तोड़ता रहा। उसे इतनी मजदूरी मिली कि वह बढ़ी हुई कीमत पर बहुत थोड़ा अनाज ही खरीद सका। वह मुट्ठीभर अनाज लेकर घर पहुँचा, पर उसकी माँ की साँसें उससे पहले ही विदा हो चुकी थीं। उस रात धरणीधर ने गाँववालों से कहा— “याद रखना, सूखा फसल को मारता है; लेकिन कठोर शासन, असमान बाजार और अपर्याप्त राहत मनुष्य को मारते हैं।” धीरे-धीरे अनेक झोपड़ियों के चूल्हे बुझ गए। लोग गाँव छोड़कर राहत शिविरों और नगरों की ओर जाने लगे। कुछ रास्ते में गिर पड़े। कुछ बीमारियों की चपेट में आ गए। जंगल खामोश होकर मनुष्य की विवशता देखता रहा। धरणीधर ने उस बालक से कहा— “यदि तुम जीवित रहो तो आने वाली पीढ़ियों को बताना—1877 में केवल वर्षा ने हमारा साथ नहीं छोड़ा था; शासन और बाजार की संवेदना भी हमसे बहुत दूर हो गई थी।” सन 2043 ईस्वी आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना की सौवीं वर्षगाँठ पर विशाल समारोह आयोजित किया गया था। मंच पर स्वतंत्रता सेनानियों, इतिहासकारों, विद्यार्थियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के चित्र लगे थे। सभा के बीच एक अत्यंत वृद्ध व्यक्ति को व्हीलचेयर पर बैठाकर मंच पर लाया गया। उसके सिर के बाल, भौहें और पलकें तक सफेद हो चुकी थीं। उसका नाम था आज़ाद धरणी। वह 1877 के धरणीधर का वंशज था। पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखी गई एक पुरानी डायरी उसकी गोद में थी। उस डायरी में अकाल के प्रत्यक्षदर्शियों की स्मृतियाँ लिखी थीं। परिवार में कहा जाता था कि जो व्यक्ति उस डायरी को पढ़ता है, वह केवल शब्द नहीं पढ़ता—वह अपने पुरखों की भूख, आँसू और आहें भी अनुभव करता है। मंच-संचालक ने पूछा— “बाबा, आज आज़ाद हिन्द सरकार की सौवीं वर्षगाँठ है। आप नई पीढ़ी को क्या संदेश देना चाहेंगे?” बुजुर्ग ने काँपते हाथों से डायरी खोली और कहा— “राजनीतिक स्वतंत्रता आवश्यक है, लेकिन भूखे मनुष्य के लिए पहली स्वतंत्रता भोजन है। यदि अनाज होते हुए भी कोई भूखा सोता है, तो स्वतंत्रता अभी अधूरी है।” सभा में सन्नाटा छा गया। एक छात्रा ने पूछा— “क्या 1876–78 का अकाल केवल वर्षा की कमी के कारण पड़ा था?” वृद्ध ने उत्तर दिया— “सूखे ने संकट का द्वार खोला था, लेकिन उसके भीतर कौन-कौन-सी शक्तियाँ प्रवेश कर गईं—यह समझना आवश्यक है। फसल खराब हुई, भोजन की उपलब्धता घटी और कीमतें बढ़ीं। परंतु इसके साथ यह भी देखना होगा कि अनाज कहाँ था, किसके अधिकार में था, कहाँ भेजा जा रहा था और भूखे लोगों की क्रय-शक्ति कितनी बची थी।” एक अर्थशास्त्री ने कहा— “सरकार ने राहत कार्य भी तो चलाए थे।” आज़ाद धरणी ने उसकी ओर देखा— “हाँ, राहत कार्य हुए। लोगों को सार्वजनिक निर्माण में काम भी दिया गया। लेकिन इतिहास का प्रश्न केवल यह नहीं कि राहत दी गई या नहीं। प्रश्न यह है कि राहत समय पर पहुँची या नहीं; उसकी मात्रा पर्याप्त थी या नहीं; मजदूरी से बढ़ी हुई कीमत पर अनाज खरीदा जा सकता था या नहीं; और काम करने में असमर्थ बच्चों, वृद्धों तथा बीमारों का क्या हुआ?” सभा में बैठे लोगों के सिर झुक गए। तभी मंच के पीछे लगी स्क्रीन पर तीन शब्द उभरे— शासन — बाजार — मानवता वृद्ध ने उनकी ओर संकेत करते हुए कहा— “आपदा में इन तीनों की परीक्षा होती है। शासन यदि केवल खाता-बही देखे, बाजार यदि केवल लाभ देखे और समाज यदि केवल अपना घर देखे, तो सूखा अकाल बन जाता है।” एक युवक ने पूछा— “तो क्या बाजार को समाप्त कर देना चाहिए?” बुजुर्ग मुस्कराया— “नहीं। व्यापार समाज की आवश्यकता है, परंतु जीवन से बड़ा कोई व्यापार नहीं हो सकता। बाजार साधन है, मनुष्य उसका साधन नहीं। जब लाभ और जीवन के बीच चुनाव करना पड़े, तो व्यवस्था को जीवन के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।” “और आज़ादी का अर्थ?” छात्रा ने पूछा। बुजुर्ग ने उत्तर दिया— “आज़ादी का अर्थ केवल विदेशी शासन का अंत नहीं। आज़ादी का अर्थ है—किसी मनुष्य को भूख के सामने असहाय न छोड़ना। किसान को उसकी उपज का न्यायपूर्ण मूल्य मिले, गरीब को भोजन उपलब्ध हो, आपदा में राहत अधिकार बने और अनाज का प्रवाह भूख की दिशा में हो—केवल अधिक लाभ की दिशा में नहीं।” उसने डायरी का अंतिम पृष्ठ खोला। वहाँ धरणीधर के शब्द लिखे थे— “अकाल वर्षा की कमी से आरम्भ हो सकता है, पर मनुष्यता की कमी उसे विनाश में बदल देती है।” ये शब्द पढ़ते-पढ़ते आज़ाद धरणी की आँखें भर आईं। ऐसा लगा मानो 1877 के जंगल में बैठा धरणीधर ही 2043 के मंच पर बोल रहा हो। वृद्ध ने अंतिम प्रश्न सभा के सामने रखा— “यदि किसी देश के गोदाम भरे हों, व्यापार चलता रहे और फिर भी मनुष्य भूख से मरें—तो दोष केवल प्रकृति का कैसे हो सकता है?” किसी के पास तत्काल उत्तर नहीं था। तब एक छोटी बच्ची मंच के पास आई और बोली— “बाबा, मैं सबसे पहले यह जानना चाहूँगी कि उस समय अनाज कहाँ था और भूखे लोगों तक क्यों नहीं पहुँचा?” वृद्ध के चेहरे पर हल्की मुस्कान उभरी। “यही इतिहास का सही प्रश्न है,” उसने कहा, “क्योंकि जो पीढ़ी यह पूछना सीख जाती है कि भोजन किसके पास था, निर्णय किसने लिया और राहत किसे मिली—वह भविष्य में अकाल को केवल प्राकृतिक दुर्घटना मानकर चुप नहीं बैठती।” समारोह समाप्त हुआ, लेकिन मंच पर लिखे तीन शब्द देर तक चमकते रहे— शासन उत्तरदायी हो। बाजार मानवीय हो। और समाज संवेदनशील हो। क्योंकि वर्षा मनुष्य के वश में नहीं हो सकती, परंतु किसी सूखे को सामूहिक भूख और मृत्यु में बदलने से रोकना—निश्चित रूप से मनुष्य के हाथ में है।

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