रविवार, 4 अक्टूबर 2026

जब ऑक्सीजन बिकने लगी?!

सन 2085 ईस्वी।
उस दिन सूर्य निकला अवश्य था, लेकिन धरती तक उसकी किरणें धुंध, धुएं और विषैली गैसों की मोटी परत को पार करके नहीं पहुंच पा रही थीं। आकाश का रंग नीला नहीं, मटमैला था। पक्षियों का कलरव वर्षों पहले शांत हो चुका था। पेड़ों की पुरानी तस्वीरें अब बच्चों को संग्रहालयों में दिखाई जाती थीं। सड़कों पर मनुष्य पीठ पर ऑक्सीजन के छोटे सिलिंडर बांधे चल रहे थे। प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में एक डिजिटल मीटर था, जो बताता था कि उसके सिलिंडर में कितनी सांसें शेष हैं। नगर के मुख्य चौराहे पर एक विशाल विज्ञापन चमक रहा था— “शुद्ध ऑक्सीजन खरीदिए—जीवन के दस अतिरिक्त घंटे पाइए!” गरीब लोग उस विज्ञापन को केवल देख सकते थे। सांस लेने का अधिकार भी अब उनकी क्रय-शक्ति पर निर्भर था। अंतिम पानी की दुकान सत्रह वर्षीय युवक आरव अपनी बीमार मां के लिए पानी लेने निकला था। नगर में प्राकृतिक जलस्रोत समाप्त हो चुके थे। नदियां रासायनिक नालों में बदल गई थीं और भूमिगत पानी विषैला हो चुका था। पानी अब सरकारी सुरक्षा में चलने वाली दुकानों पर मिलता था। उस दिन दुकान के बाहर कई किलोमीटर लंबी पंक्ति लगी थी। एक वृद्ध व्यक्ति बार-बार कह रहा था— “थोड़ा पानी दे दो! मेरी बच्ची दो दिन से प्यासी है।” लेकिन मशीन ने उत्तर दिया— “आपकी जल-सीमा समाप्त हो चुकी है।” वृद्ध ने अपने हाथ जोड़ लिए, पर मशीन के भीतर करुणा का कोई कार्यक्रम नहीं था। आरव के पीछे खड़ी एक वृद्धा बोली— “कभी लोग पानी बहाकर सड़कें धोते थे। लाखों लीटर भूजल उद्योगों और विलासिता पर खर्च होता था। तब जिन्होंने चेतावनी दी, उनका मजाक उड़ाया गया।” अचानक दुकान की स्क्रीन पर संदेश आया— “जल-भंडार समाप्त। अगली आपूर्ति अनिश्चित।” भीड़ में भगदड़ मच गई। आरव खाली पात्र लेकर घर की ओर दौड़ा। रास्ते में उसकी मां का संदेश आया— “बेटा, जल्दी आना… सांस लेने में कठिनाई हो रही है।” लेकिन आरव के पास न पानी था, न नया ऑक्सीजन सिलिंडर खरीदने के पैसे। उसने आकाश की ओर देखकर चीखते हुए कहा— “क्या मनुष्य को इसी प्रकार तड़प-तड़पकर मरना था?” ब्रह्मांड चेतना की दिव्य धारा नगर से बाहर एक सूखा जंगल था। वहां कभी एक ध्यान-केंद्र हुआ करता था। आरव निराश होकर उसी ओर चला गया। केंद्र का भवन खंडहर बन चुका था, लेकिन उसके भीतर एक प्राचीन ध्यान-कक्ष सुरक्षित था। दीवार पर लिखा था— “अपनी चेतना को ब्रह्मांड चेतना से जोड़ने के अभ्यास में लगो।” आरव जमीन पर बैठ गया। ऑक्सीजन कम होने से उसका सिर चकरा रहा था। उसने आंखें बंद कीं और पहली बार अपनी प्रत्येक सांस को ध्यान से अनुभव किया। धीरे-धीरे बाहर का शोर दूर होने लगा। उसे लगा जैसे अंतरिक्ष की गहराई से एक दिव्य प्रकाश-धारा उसके हृदय में उतर रही हो। उस धारा का कोई भौतिक रूप नहीं था। वह प्रकाश भी थी, प्रश्न भी और चेतावनी भी। उसके भीतर एक वाणी गूंजी— “जब मैं कृष्ण-अवतार के रूप में अर्जुन के सम्मुख था, तब जो संदेश दिया गया था, वह केवल कुरुक्षेत्र के लिए नहीं था। प्रत्येक युग का मनुष्य अपने मोह, भय और कर्तव्य के बीच खड़ा अर्जुन है।” आरव ने पूछा— “लेकिन आज हमारा कुरुक्षेत्र कहां है?” वाणी ने उत्तर दिया— “तुम्हारा शरीर भी कुरुक्षेत्र है, तुम्हारा समाज भी और यह संकटग्रस्त पृथ्वी भी। जहां धर्म और अधर्म, संरक्षण और विनाश, करुणा और लोभ के बीच संघर्ष हो रहा है—वहीं कुरुक्षेत्र है।” अर्जुन ने हथियार क्यों रखे थे? आरव ने एक विशाल दृश्य देखा। पृथ्वी के चारों ओर सत्ता, धन और प्रतिष्ठा के ऊंचे सिंहासन खड़े थे। वार्ड से लेकर गांव, नगर, जनपद, राज्य, देश और विश्व तक प्रभावशाली लोग उन पर बैठे थे। उनमें राजनेता, अधिकारी, उद्योगपति, धर्माधिकारी, व्यापारी और प्रचारक थे। सभी एक जैसे नहीं थे, लेकिन अनेक लोग ऐसी व्यवस्था से लाभ उठा रहे थे जो जंगल, जल, भूमि और श्रम का निरंतर दोहन कर रही थी। उनके सामने सामान्य जनता हाथ जोड़े खड़ी थी। दिव्य वाणी ने कहा— “जिनके पद और सम्मान के मोह में तुम सत्य का धनुष रख देते हो, उनमें से कुछ ही पृथ्वी के विनाशकारी तंत्र के रक्षक बन जाते हैं। व्यक्ति के सम्मान और उसके अन्याय के समर्थन में अंतर करना सीखो।” आरव बोला— “लेकिन वे हमारे बड़े हैं, हमारे नेता और हमारे आका हैं। उनके विरुद्ध कैसे खड़े हों?” वाणी ने कहा— “अर्जुन ने भी अपने सामने गुरु, पितामह और संबंधियों को देखा था। उसका मोह स्वाभाविक था। कृष्ण का संदेश संबंधियों से घृणा करना नहीं, धर्म के पक्ष में मोह से ऊपर उठना था। यहां हथियार का अर्थ हिंसा नहीं है। आज तुम्हारा हथियार है—सत्य, वैज्ञानिक चेतना, अहिंसक प्रतिरोध, संवैधानिक अधिकार, प्रकृति-संरक्षण और अपना संयमित जीवन।” दूसरी धरती की खोज दृश्य बदला। आरव ने देखा कि विशाल अंतरिक्षयान पृथ्वी से उड़ रहे हैं। अरबों की धनराशि दूसरी दुनिया में पानी और रहने योग्य भूमि खोजने पर खर्च की जा रही थी। उसी समय पृथ्वी पर नदियां विषैली हो रही थीं और जंगल काटे जा रहे थे। वह व्यथित होकर बोला— “मनुष्य दूसरी धरती पर पानी खोजता रहा, लेकिन अपनी धरती का पानी क्यों नहीं बचा पाया?” वाणी ने उत्तर दिया— “अंतरिक्ष की खोज अपने आप में अपराध नहीं; ज्ञान की खोज मानवता की उपलब्धि हो सकती है। भूल तब होती है, जब मनुष्य दूर के ग्रह पर जीवन खोजे लेकिन अपने घर के जीवित जंगल को नष्ट होने दे। समस्या विज्ञान नहीं, विवेकहीन लोभ है।” आरव ने अंतरिक्ष के चारों ओर घूमता मलबा देखा—निष्क्रिय उपग्रह, टूटे यान और धातु के हजारों टुकड़े। वाणी फिर बोली— “मनुष्य ने धरती ही नहीं, अंतरिक्ष के निकटवर्ती क्षेत्र में भी अपना कचरा पहुंचा दिया। विकास यदि उत्तरदायित्व से अलग हो जाए तो उपलब्धि भी संकट बन सकती है।” “सभी धर्मों को त्यागकर मेरी शरण में आओ” अचानक आरव के सामने अनेक धार्मिक झंडे दिखाई दिए। प्रत्येक झंडे के नीचे लोग अपने-अपने ईश्वर की श्रेष्ठता सिद्ध करने में लगे थे। लेकिन उनके पीछे नदियां सूख रही थीं, जंगल जल रहे थे और भूखे मनुष्य सहायता मांग रहे थे। आरव ने पूछा— “दिव्य वाणी! कृष्ण के ‘सब धर्मों को त्यागकर मेरी शरण में आने’ के संदेश का क्या अर्थ है? क्या सभी परम्पराएं छोड़ देनी चाहिए?” उत्तर आया— “यहां ‘धर्म’ का अर्थ केवल धार्मिक समुदाय नहीं है। मनुष्य अपने अहंकार, पद, पहचान, स्वार्थ और कृत्रिम कर्तव्यों को भी धर्म मान बैठता है। जब ये पहचानें सत्य, करुणा और समष्टि-कल्याण के मार्ग में बाधा बन जाएं, तब उन्हें छोड़कर परम सत्य की शरण में आना आवश्यक है। मेरी शरण का अर्थ किसी विशेष वेश, संस्था अथवा नारे की शरण नहीं। सत्य, प्रेम, न्याय और समर्पण में प्रवेश करना ही दिव्य शरण है।” “लेकिन लोग ‘मैं’, ‘तू’, ‘मेरा’ और ‘तेरा’ में क्यों उलझ गए?” “क्योंकि उन्होंने शब्द पकड़े, अनुभव नहीं। उन्होंने कृष्ण की मूर्ति देखी, लेकिन कृष्ण-चेतना को अपने भीतर नहीं खोजा। ‘मेरी शरण में आओ’ को बाहरी व्यक्तित्व की पूजा समझ लिया, आत्मसाक्षात्कार का निमंत्रण नहीं।” नास्तिक और आदिवासी से सीख आरव के सामने फिर दो दृश्य आए। पहले दृश्य में एक व्यक्ति स्वयं को नास्तिक कहता था। वह किसी ईश्वर की पूजा नहीं करता था, लेकिन घायल पशु की सेवा करता, ईमानदारी से श्रम करता, झूठ से बचता और अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुएं जमा नहीं करता था। दूसरे दृश्य में एक आदिवासी समुदाय था। वह जंगल को निजी संपत्ति नहीं, सामूहिक जीवनदाता मानता था। नदी उसके लिए केवल पानी नहीं, पूर्वजों की धरोहर थी। वह वृक्ष से उतना ही लेता था, जितना जीवन के लिए आवश्यक था। वाणी ने पूछा— “इन दोनों में ईश्वर से दूर कौन है?” आरव उत्तर नहीं दे पाया। वाणी बोली— “जो ईश्वर का नाम लेकर प्रकृति नष्ट करता है, वह ईश्वरता से दूर हो सकता है। जो स्वयं को नास्तिक कहकर भी सत्य, करुणा और सह-अस्तित्व में जीता है, वह ईश्वरीय गुणों के निकट हो सकता है। आदिवासी समुदायों को एक ही रूप में आदर्श मानना उचित नहीं, क्योंकि प्रत्येक समुदाय अलग है। फिर भी उनकी अनेक जीवन-पद्धतियों से सामुदायिकता, सीमित उपभोग और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व सीखा जा सकता था। आधुनिक मनुष्य ने उन्हें पिछड़ा कहा, लेकिन स्वयं विकास के नाम पर अपने भविष्य की जड़ें काटता रहा।” कल्कि कौन है? आरव ने पूछा— “अब कल्कि महाराज कब आएंगे? क्या वे श्वेत घोड़े पर बैठकर इस विनाशकारी व्यवस्था को समाप्त करेंगे?” दिव्य प्रकाश कुछ अधिक उज्ज्वल हो गया। वाणी ने कहा— “यदि तुम केवल किसी बाहरी उद्धारकर्ता की प्रतीक्षा में बैठे हो तो तुमने फिर वही भूल की। कल्कि को केवल एक आने वाले व्यक्तित्व तक सीमित मत करो। कल्कि उस प्रखर विवेक का प्रतीक भी है जो कलियुग के अज्ञान, अन्याय, लोभ और प्रदूषण को काटता है। श्वेत घोड़ा तुम्हारी शुद्ध और तीव्र संकल्प-शक्ति है। तलवार हिंसा की नहीं—ज्ञान, सत्य और विवेक की है। कल्कि अभियान पहले मनुष्य के भीतर प्रारम्भ होगा, तभी समाज और व्यवस्था में उतरेगा।” “तो हम इस अभियान में कैसे सज्ज हों?” वाणी ने आरव को सात संकल्प दिए। कल्कि अभियान के सात अस्त्र पहला—आत्मशुद्धि। जिस लोभ का विरोध संसार में करना है, पहले उसे अपने भीतर पहचानो। आवश्यकता और लालच के अंतर को समझो। दूसरा—जल-संरक्षण। वर्षाजल बचाओ, तालाबों और नदियों को पुनर्जीवित करो, भूजल के अंधाधुंध दोहन का विरोध करो तथा पानी को व्यापारिक वस्तु बनने से बचाओ। तीसरा—वृक्ष और जैव-विविधता। केवल पौधारोपण की तस्वीर नहीं; लगाए गए वृक्षों की वर्षों तक रक्षा करो। स्थानीय प्रजातियों, जंगलों, मिट्टी और जीव-जंतुओं को जीवन-तंत्र मानो। चौथा—शुद्ध वायु का अधिकार। प्रदूषण के स्रोतों पर वैज्ञानिक और कानूनी कार्रवाई की मांग करो। स्वच्छ ऊर्जा, सार्वजनिक यातायात और स्थानीय हरियाली को बढ़ावा दो। पांचवां—अहिंसक जनसंगठन। वार्ड, गांव और नगर स्तर पर जल, जंगल, भूमि, कचरा और प्रदूषण की जनसमितियां बनाओ। अभियान किसी जाति, मजहब या दल का नहीं, जीवन का हो। छठा—सत्यपूर्ण विज्ञान और उत्तरदायी तकनीक। विज्ञान का विरोध मत करो; उसे पूंजी और सत्ता की अंधी सेवा से मुक्त कर मानवता तथा प्रकृति की सेवा में लगाओ। अंतरिक्ष की खोज हो, लेकिन पृथ्वी की कीमत पर नहीं। सातवां—ब्रह्मांड चेतना से संबंध। प्रतिदिन कुछ समय शांत बैठो। सांस, शरीर, अंतस ऊर्जा और समस्त जीवन की एकता का अनुभव करो। जिस दिन दूसरे का दर्द अपना लगेगा, उस दिन प्रकृति का विनाश करना कठिन हो जाएगा। अभियान का आरम्भ अचानक आरव की चेतना लौटी। उसके ऑक्सीजन मीटर में बहुत कम समय बचा था। लेकिन अब वह भय से जड़ नहीं था। खंडहर से बाहर निकलते समय उसे भूमिगत कमरे में वर्षाजल संचयन की एक पुरानी टंकी दिखाई दी। उसमें थोड़ा स्वच्छ पानी बचा था। उसने पहले स्वयं पानी नहीं पिया। पात्र भरा और मां के लिए दौड़ पड़ा। इसके बाद उसने नगर के युवकों को संगठित किया। उन्होंने किसी व्यक्ति को कल्कि घोषित नहीं किया और न किसी समुदाय को शत्रु बनाया। उन्होंने अपने अभियान का नाम रखा— “कल्कि महाराज अभियान—अंतस शुद्धि से पृथ्वी की रक्षा तक।” उन्होंने सूखे तालाबों की सफाई शुरू की, वर्षाजल-संग्रह की पुरानी प्रणालियां पुनर्जीवित कीं, प्रदूषण के आंकड़े सार्वजनिक किए और प्रत्येक वार्ड में ऑक्सीजन देने वाले स्थानीय वृक्षों की रक्षा के लिए समूह बनाए। कुछ प्रभावशाली लोगों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। किसी ने कहा— “विकास के विरुद्ध ये लोग नगर को पीछे ले जाना चाहते हैं।” आरव ने उत्तर दिया— “हम विकास के विरुद्ध नहीं, उस विकास के विरुद्ध हैं जो जीवन का आधार ही समाप्त कर दे।” किसी ने उन्हें हिंसा के लिए उकसाया। आरव ने कहा— “हमारी तलवार विवेक है। हमारा युद्ध व्यक्ति से नहीं, विनाशकारी प्रवृत्ति से है।” धीरे-धीरे किसान, विद्यार्थी, वैज्ञानिक, शिक्षक, चिकित्सक और धार्मिक प्रतिनिधि अभियान से जुड़ने लगे। नास्तिक भी आए और आस्तिक भी। किसी से उसकी पूजा-पद्धति नहीं पूछी गई। केवल इतना पूछा गया— “क्या तुम जल, वायु, धरती और मानवता की रक्षा के लिए अपना जीवन थोड़ा संयमित करने को तैयार हो?” अंतिम संदेश वर्षों बाद उसी नगर में वर्षा हुई। बच्चे पहली बार बिना ऑक्सीजन सिलिंडर के कुछ घंटे खुले मैदान में खेल सके। आरव ने आकाश की ओर देखा। उसे फिर वही दिव्य धारा अनुभव हुई— “मैं किसी एक शरीर, नाम या युग में सीमित नहीं हूं। जब तुम सत्य के लिए मोह त्यागते हो, जब जल की एक बूंद बचाते हो, जब वृक्ष को अपने जीवन की तरह देखते हो, जब सत्ता के भय से ऊपर उठकर मानवता के पक्ष में खड़े होते हो—तभी कृष्ण का संदेश जीवित होता है और कल्कि अभियान प्रारम्भ होता है।” पृथ्वी को बचाने के लिए किसी चमत्कारी अवतार की प्रतीक्षा पर्याप्त नहीं। बाहरी कल्कि के स्वागत की पहली तैयारी अपने भीतर के लोभ, घृणा, अहंकार और निष्क्रियता का अंत है। कल्कि महाराज अभियान का अर्थ मनुष्यों के विरुद्ध युद्ध नहीं—मनुष्य के भीतर और व्यवस्था में बैठी विनाशकारी प्रवृत्तियों के विरुद्ध सत्यपूर्ण, वैज्ञानिक, अहिंसक तथा आध्यात्मिक अभियान है। ऑक्सीजन समाप्त होने और पानी के लिए तड़पने से पहले मनुष्य को जागना होगा—क्योंकि परमात्मा की शरण में जाना पृथ्वी से भागना नहीं, उसकी रक्षा की जिम्मेदारी स्वीकार करना भी है।

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